भारत में कई ऐतिहासिक धरोहर हैं, जो कि देश की सांस्कृतिक विरासत और समृद्ध इतिहास के बारे में बताते हैं। ऐसी धरोहरों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है। इस कड़ी में क्या आप जानते हैं कि ‘भारतीय पुरातत्व का जनक’ किसे कहा जाता है ? इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे।
किसे कहा जाता है ‘भारतीय पुरातत्व का जनक’
अब हम यह जान लेते हैं कि आखिर किस व्यक्ति को ‘भारतीय पुरातत्व का जनक’ कहा जाता है, तो आपको बता दें कि अलेक्जेंडर कनिंघम को यह उपाधि दी गई है। उनका जन्म 23 जनवरी, 1814 को लंदन में हुआ था। उन्होंने इंग्लैंड के प्रसिद्ध मिलिट्री कॉलेज से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी।
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बंगाल इंजीनियर्स से हुई भारत में शुरुआत
अलेक्जेंडर 1833 में 19 साल की आयु में बंगाल इंजीनियर्स में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में भारत आए थे। यहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध विद्वान रहे जेम्स प्रिंसेप से हुई थी, जिन्होंने पहली बार ब्राह्मी लिपि को पढ़ा था। कनिंघम उनके काम से बहुत प्रभावित थे।
शुरू किया सिक्कों का अध्ययन
कनिंघम ने अपने शुरुआती दिनों में पुराने सिक्कों को अध्ययन किया। इससे उन्हें राजाओं के कालक्रम को समझने में आसानी हुई। उन्होंने भारत के प्राचीन स्थानों को खोजने के लिए चीनी यात्रियों की डायरियों को पढ़ा। इसमें फाहियान और ह्वेनसांग की डायरियों की मदद ली गई थी। कनिंघम ने डायरी की मदद से बौद्ध स्थलों की दूरियां और दिशाओं की मदद से कई लुप्त शहरों को दोबारा खोज लिया था।
कनिंघम द्वारा किए गए प्रमुख कार्य
कनिंघम ने भारत में रहकर विभिन्न सर्वेक्षण करवाए और लुप्त हो चुके प्राचीन स्थलों को ढूंढा, जिन्हें आज देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।
सारनाथ-कनिंघम ने वाराणसी के पास सारनाथ में खुदाई करवाई थी, जहां बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था।
सांची के स्तूप- कनिंघम ने सांची के स्तूपों को सर्वेक्षण किया और इस पर अपनी पुस्तक 'द भिलसा टोप्स' भी लिखी।
महाबोधि मंदिर- उन्होंने बिहार के बोधगया में महाबोधि मंदिर की खुदाई करवाई थी।
हड़प्पा की सील- कनिंघम ने 1872-73 हड़प्पा सभ्यता की अनोखी सील खोजी थी।
1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करवाई
कनिंघम ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना के लिए प्रयास किये और 1861 में उनके प्रयासों से तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना की। कनिंघम पहले पुरातात्विक सर्वेक्षक और 1871 में पहले महानिदेश बने। उन्होंने भारत में रहकर 1885 तक अपनी सेवाएं दी और इसके बाद वह इंग्लैंड चले गए, जहां 1893 में उन्होंने अंतिम सांस ली।
