उत्तर प्रदेश में यूं तो बहुत-से किले हैं, जो कि अपने इतिहास और वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं। इस कड़ी में यूपी की राजधानी लखनऊ में स्थित कसमंडी यूपी के प्रमुख किलों में आता है, जो कि इन दिनों चर्चाओं में बना हुआ है। यह किला मलिहाबाद एरिया में स्थित है, जिसका इतिहास कई वर्षों पुराना है। इस किले में आज भी 1857 के विद्रोह के निशान दिखते हैं। इस लेख में हम इस किले के बारे में विस्तार से जानेंगे।
कब हुई थी स्थापना
पौराणिक कथाओं और स्थानीय लोगों के मुताबिक, कसमंडी किले की स्थापना राजा कंस के वंशजों या राजा कस द्वारा की गई थी। इसके निर्माण का काल 980 से 1031 ईस्वी बताया जाता है। किले का निर्माण नागवंशी महाराजा कंस पासी द्वारा करवाया गया था, जिनके नाम पर यह कसमंडी पड़ा।
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किले पर किस-किसका रहा शासन
मध्यकालीन भारत में अवध के इस एरिया में ‘भर’ और ‘पासी’ शासकों का शासन हुआ करता था। कसमंडी उनके प्रमुख किलों में से एक था। हालांकि, बाद में कसमंडी पर गौर राजपूतों का अधिकार रहा था। राजा जेठ सिंह कसमंडी के प्रमुख और शक्तिशाली जमींदार हुआ करते थे। यहां अवध के नवाबों और राजपूतों के के बीच 18वीं और 19वीं सदी में संघर्ष भी देखा गया।
किस प्रकार बना है किला
अवध के इस किले का निर्माण मिट्टी और लाखौरी ईंटों से किया गया है। इसमें चूने के गारे से चिनाई की गई है। किले को सुरक्षा प्रदान करने के लिए इसके चारों ओर गहरी खाई और बड़े-बड़े बुर्ज(टॉवर) बनाए गए थे, जिससे कोई भी बाहरी व्यक्ति आसानी से किले में प्रवेश नहीं कर सके।
किले से जुड़ा 1857 की क्रांति का इतिहास
1857 की क्रांति में मलिहाबाद, काकोरी और कसमंडी में भयंकर विद्रोह हुआ था। यहां के जमींदारों और स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई थी और कसमंडी किले को अपने मोर्चे के रूप में इस्तेमाल किया था। ऐसे में अंग्रेजों द्वारा इस किले पर भारी गोलाबारी की गई थी, जिससे किले को नुकसान पहुंचा था।
आज क्या है किले की स्थिति
आज यह किला देखरेख के अभाव में खंडहर बन चुका है। आज भी इस किले की ऊंची-ऊंची दीवारें और लाखौरी ईंटों से बने दरवाजे देखे जा सकते हैं।
किले से जुड़ा गजेटियर का प्रमाण
पासी समाज द्वारा किले के इतिहास को लेकर पुराने ब्रिटिश गजेटियर का हवाला दिया जाता है। इसके मुताबिक, 11वीं सदी में सालार मसूद गाजी के दो सेनापतियों को महाराजा कंस पासी ने इसी एरिया में युद्ध के दौरान मार गिराया था। वहीं, दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह जगह सदियों से मस्जिद, मजार और मकबरा है और वक्फ बोर्ड के आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज है।
