भारतीय शिक्षा से जुड़े महत्त्वपूर्ण आयोग और उनकी सिफारिशें, देखें लिस्ट

भारत में आधुनिक शिक्षा का आधार देने में ब्रिटिश काल और इसके बाद गठित हुए आयोगों  की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इस लेख में हम इन आयोगों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

Jun 9, 2026, 13:30 IST
शिक्षा से जुड़े आयोग
शिक्षा से जुड़े आयोग

भारतीय शिक्षा का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें अतीत के पन्नों में वर्तमान के आधुनिक शिक्षा की नींव देखने को मिलती है। क्योंकि, ब्रिटिश काल और आजादी के बाद कई ऐसे आयोगों का गठन किया गया है, जो कि शिक्षा से सीधे जुड़े हुए थे और इनकी सिफारिशों के आधार पर भारत की शिक्षा व्यवस्था तैयार हो सकी। आयोगों ने भारत की पारंपरिक शिक्षा को आधुनिक, वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा के साथ जोड़ा। यदि आप किसी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, तब तो यह लेख आपके लिए और भी उपयोगी है। वहीं, सामान्य ज्ञान के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण लेख है।

वुड्स डिस्पैच (Wood's Despatch) - 1854

वुड्स डिस्पैच को बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड ने तैयार किया था। इसे भारतीय शिक्षा का ‘मैग्ना कार्टा’ कहा जाता है। उन्होंने अपनी सिफारिशों में मैकाले की फिल्ट्रेशन थ्योरी को खारिज करने के साथ जन-शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार पर डाली थी। साथ ही, उन्होंने प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा और उच्च शिक्षा में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने की भी वकालत की थी। इनकी सिफारिशों के आधार पर ही 1857 में कलकत्ता, मद्रास और बांबे विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थी। वुड्स द्वारा महिला शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया था।

नोटः UPPSC सिविल सेवा में पूछा गया सवाल

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हंटर शिक्षा आयोग (Hunter Education Commission) - 1882

इस आयोग का गठन सर विलियम हंटर की अध्यक्षता में किया गया था, जिसका कार्य वुड्स डिस्पैच की समीक्षा की करना था। इस आयोग ने अपनी सिफारिशों में प्राथमिक शिक्षा पर जोर देते हुए उसके सुधार की बात कही थी। इसके अतिरिक्त, हंटर आयोग की सिफारिश में हाई स्कूल स्तर की शिक्षा को दो भागों में बांटने का सुझाव दिया गया था, जिसमें विश्वविद्यालय प्रवेश के लिए साहित्यिक और व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया गया था। 

सैडलर आयोग या कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग - 1917

सैडलर आयोग का गठन डॉ. एम. ई. सैडलर की अध्यक्षता में किया गया था, जिसे कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग के नाम से भी जाना जाता है। इसमें दो भारतीय सदस्य, सर आशुतोष मुखर्जी और डॉ. जियाउद्दीन अहमद को भी शामिल किया गया था। आयोग ने अपनी सिफारिशों में 12 वर्षीय स्कूली शिक्षा को विश्वविद्यालय से अलग करने का सुझाव दिया था। साथ ही, ग्रेजुएशन की डिग्री की अवधि को 3 वर्ष करने का सुझाव भी सैडलर कमीशन का ही था। इस आयोग की सिफारिश पर ही भारत में राज्य शिक्षा बोर्ड की स्थापना की गई थी। 

नोटः सैडलर कमीशन पर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में सवाल आ चुका है।

सार्जेंट योजना (Sargent Plan) - 1944

इस योजना को भारत के शिक्षा सलाहकार रहे सर जॉन सार्जेंट द्वारा तैयार किया गया था। योजना ने अपनी सिफारिशों में भारत के शिक्षा स्तर को अगले 40 सालों में ब्रिटेन के शिक्षा स्तर तक करने की बात कही गई थी। साथ ही, योजना में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की वकालत भी की गई थी।

राधाकृष्णन आयोग / विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948-49)

यह आजाद भारत का पहला शिक्षा आयोग था, जिसके अध्यक्ष डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन बने थे। आयोग ने अपनी सिफारिशों में उच्च शिक्षा को सुधारने पर जोर दिया था। साथ ही, इस आयोग की सिफारिश पर ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्थापना 1953 में की गई थी। इस आयोग की सिफारिशों में कॉलेजों में व्यावसायिक प्रशिक्षण की भी वकालत की गई थी।

मुदालियर आयोग / माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952-53)

इस आयोग के अध्यक्ष डॉ. ए. लक्ष्मणस्वामी मुदालियर थे। आयोग का मुख्य उद्देश्य माध्यमिक शिक्षा के ढांचे की समीक्षा करना था। इस आयोग ने अपनी सिफारिशों में 3 वर्षीय माध्यमिक और 4 वर्षीय उच्चतर माध्यमिक शिक्षा प्रणाली का सुझाव दिया था।  वहीं, आयोग ने अपनी सिफारिशों में छात्रों को तकनीकी और व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए बहुउद्देशीय स्कूलों की भी बात की थी।

कोठारी शिक्षा आयोग (1964-66) 

इस आयोग के अध्यक्ष डॉ. डी. एस. कोठारी थे। यह भारत का पहला ऐसा आयोग बना था, जिसने प्राइमरी एजुकेशन से लेकर यूनिवर्सिटी स्तर तक की शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह अध्ययन किया था। इस आयोग ने अपनी सिफारिशों में देश के लिए 10+2+3 के शिक्षा ढांचे का प्रस्ताव रखा था। वहीं, भारतीय शिक्षा में  'त्रिभाषा सूत्र' (Three-Language Formula) की सिफारिश भी इसी आयोग द्वारा की गई थी। आयोग ने अपनी सिफारिशों में इस बात पर जोर दिया था कि देश के बेहतर विकास के लिए सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 6% खर्च होना चाहिए। कोठारी शिक्षा के आयोग पर ही 1968 में भारत की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तैयार किया गया था।

यशपाल समिति रिपोर्ट (1993 और 2009)

1993 की रिपोर्ट में स्कूली बच्चों के बस्ते को बोझ कम करने और रट्टा मार प्रणाली को खत्म करने पर जोर दिया गया था, जबकि 2009 की रिपोर्ट में विज्ञान, कला और कॉमर्स के बीच की सीमाओं को खत्म करने की सिफारिश की गई थी।

कस्तूरीरंगन समिति / राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020

इस समिति के अध्यक्ष डॉ. के. कस्तूरीरंगन थे। इस समिति के मसौदे के आधार पर सरकार ने 34 साल पुरानी नीति (1986) को बदलकर 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' को मंजूरी प्रदान की थी। इस आयोग ने 

10+2 ढांचे के बदले 5+3+3+4 का नया पाठ्यचर्या ढांचे की सिफारिश की, जिसमें 3 वर्ष की Pre-schooling को भी शामिल किया गया है। वहीं, उच्च शिक्षा में Multiple Entry और Exit की सुविधा की बात भी की गई।

Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

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