भारत में आपने अलग-अलग प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में पढ़ा और सुना होगा। इस कड़ी में क्या आप भारत के उस व्यक्ति के बारे में जानते हैं, जिसे ‘Tiger Man of India’ के नाम से भी जाना जाता है। इस व्यक्ति का जन्म राजस्थान के जोधपुर में हुआ था और शेरों के दुनिया में अपने द्वारा किए गए अथक प्रयासों की वजह से भी इस व्यक्ति को ‘भारत का शेर’ कहा जाता है। कौन थे यह व्यक्ति, जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
किस व्यक्ति को कहा जाता है ‘Tiger Man of India’
अब हम यह जान लेते हैं कि किस व्यक्ति को ‘Tiger Man of India’ कहा जाता है। आपको बता दें कि भारत में कैलाश सांखला (Kailash Sankhala) को 'टाइगर मैन ऑफ इंडिया' (Tiger Man of India) के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 30 जनवरी 1925 को राजस्थान के जोधपुर में हुआ था। भारतीय वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में विशेष रूप से बाघों को विलुप्त होने से बचाने में उनका योगदान सबसे महान और ऐतिहासिक माना जाता है।
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कैलाश सांखला को क्यों मिली यह उपाधि
1960 और 70 के दशक में भारत में बाघों का अंधाधुंध शिकार हो रहा था। राजा-महाराजाओं और ब्रिटिश अधिकारियों के शिकार के शौक के कारण बाघों की संख्या, जो कभी हजारों में थी, वह 1970 तक गिरकर मात्र 1,800 के आसपास रह गई थी। एक वन अधिकारी के रूप में कैलाश सांखला ने इस परेशानी को बहुत करीब से देखा और इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने 1969 में IUCN के सम्मेलन में बाघों को बचाने के लिए जोरदार अपील की। उनके इन्हीं अथक प्रयासों के कारण 1970 में भारत में बाघों के शिकार पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया।
'प्रोजेक्ट टाइगर' के पहले निदेशक
उनके काम का सबसे बड़ा मील का पत्थर Project Tiger था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सहयोग से 1973 में 'प्रोजेक्ट टाइगर' की शुरुआत की गई और कैलाश सांखला को इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट का पहला निदेशक नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में देश भर में बाघों को बचाने के लिए कई टाइगर रिजर्व स्थापित किए गए और वैज्ञानिक तरीके से बाघों की गणना शुरू की गई।
पुस्तकें और अंतरराष्ट्रीय ख्याति
उन्होंने बाघों के जीवन, व्यवहार और संरक्षण पर कई प्रसिद्ध पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें Tiger! The Story of the Indian Tiger और Return of the Tiger प्रमुख हैं। उन्होंने 'टाइगर ट्रस्ट' की भी स्थापना की, जो आज भी वन्यजीव संरक्षण के लिए काम कर रहा है।
सम्मान और विरासत
वन्यजीव संरक्षण में उनके इस योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1992 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें 'राजस्थान रत्न' भी मरणोपरांत दिया गया।
