आम बोलचाल में हिरासत (Custody) और गिरफ्तारी (Arrest) को एक ही मान लिया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से इनमें एक बुनियादी और बहुत बड़ा अंतर होता है। कानून का सीधा सिद्धांत यह है कि हर गिरफ्तारी में व्यक्ति पुलिस की हिरासत में होता है, लेकिन पुलिस की हर हिरासत गिरफ्तारी नहीं होती। इस लेख में हम हम इन दोनों के बीच अंतर को जानेंगे।
हिरासत और गिरफ्तारी में अंतर
अब हम हिरासत और गिरफ्तारी में बेसिक अंतर को समझ लेते हैं।
हिरासत : इसका सीधा अर्थ है किसी व्यक्ति की आवाजाही पर रोक लगाना या उसे अपनी निगरानी में रखना। जब पुलिस किसी व्यक्ति को केवल पूछताछ के लिए, किसी संदेह को दूर करने के लिए या गवाह के तौर पर थाने ले जाती है या बैठाकर रखती है, तो वह 'हिरासत' है। इसमें व्यक्ति औपचारिक रूप से मुजरिम या आरोपी नहीं होता।
गिरफ्तारी: यह एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है। जब पुलिस के पास किसी व्यक्ति के खिलाफ पुख्ता सुबूत या FIR होती है और उसे औपचारिक रूप से अपराध का आरोपी मानकर कानून के तहत उसकी आजादी पूरी तरह छीन ली जाती है, तो उसे 'गिरफ्तारी' कहते हैं।
कागजी कार्रवाई का होता है अंतर
हिरासत और गिरफ्तारी में कागजी कार्रवाई का अंतर होता है।
अरेस्ट मेमो: गिरफ्तारी के समय पुलिस के लिए 'अरेस्ट मेमो' बनाना, गिरफ्तारी का कारण लिखित में बताना और पुलिस स्टेशन की जनरल डायरी (GD) में दर्ज करना अनिवार्य है। केवल हिरासत में लेने जैसे पूछताछ के लिए बुलाने पर अरेस्ट मेमो नहीं बनता।
कोर्ट में पेशी: गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। वहीं, अगर कोई व्यक्ति सिर्फ 'पूछताछ की हिरासत' में है, तो पुलिस पूछताछ पूरी होने के बाद उसे घर जाने दे सकती है।
अवैध हिरासत और बचाव के नियम
-भारत में पुलिस किसी को भी अनिश्चित काल के लिए थाने में बैठाकर नहीं रख सकती। अगर पुलिस किसी व्यक्ति को केवल 'पूछताछ' के बहाने बिना अरेस्ट मेमो बनाए 24 घंटे से ज्यादा थाने में रोककर रखती है, तो कानून की नजर में यह 'अवैध हिरासत' मानी जाती है।
-यदि पुलिस ने किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत में रखा है और उसे कोर्ट में पेश नहीं कर रही है, तो उसके परिजन सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका दायर कर सकते हैं। इसके तहत कोर्ट पुलिस को आदेश देता है कि वह उस व्यक्ति को तुरंत जज के सामने पेश करे।
-पुलिस नए कानून (BNSS की धारा 170 / पुरानी CrPC 151) के तहत किसी व्यक्ति को बिना अपराध किए भी हिरासत में या गिरफ्तार कर सकती है, यदि पुलिस को पुख्ता शक हो कि वह कोई गंभीर अपराध करने वाला है या उससे शांति भंग हो सकती है। लेकिन, इस स्थिति में भी बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के उसे 24 घंटे से ज्यादा नहीं रोका जा सकता।
