बिहार को बुद्ध की धरती कहा जाता है। इस धरती को ज्ञान की धरती के साथ-साथ वीरों की भूमि भी कहा जाता है। इस कड़ी में यहां एक वीर ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने 80 वर्ष की आयु में अंग्रेजों से लोहा लिया था। यही वजह है कि उन्हें ‘बिहार का शेर’ भी कहा जाता है। उन्होंने 1857 की क्रांति में बिहार से नेतृत्व किया था। इस लेख में हम उनके बारे में विस्तार से जानेंगे।
किसे कहा जाता है ‘बिहार का शेर’
सबसे पहले हम यह जान लेते हैं कि ‘बिहार का शेर’ बाबू वीर कुंवर सिंह को कहा जाता है। यह 1857 की क्रांति के नायक हैं, जिन्होंने अंग्रेजों को दांतों तले चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया था। जब लोग 80 वर्ष की आयु में अपने अंतिम पल गिन रहे होते हैं, तब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था और क्रांतिकारी के रूप में आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। उनका जन्म 1777 में बिहार के जगदीशपुर में राजपूत परिवार राजा साहबजादा सिंह के घर में हुआ था।
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गुरिल्ला युद्ध नीति से अंग्रेजों को हराया
वीर कुंवर सिंह गुरिल्ला युद्ध नीति में माहिर थे। उन्होंने अपने इस कौशल का उपयोग करते हुए कई बार अंग्रेजों को धूल चटाई थी। यही वजह थी कि अंग्रेजी सेना एक बुजुर्ग व्यक्ति से भी डरकर रहती थी।
गंगा नदी को समर्पित किया था अपना हाथ
दानापुर को अंग्रेजों से मुक्त कराने के बाद वह अपनी सेना के साथ गंगा नदी को पार कर रहे थे। इस दौरान अंग्रेजी सेना के जनरल डगलस ने उनकी नाव पर गोलियों की बौछार कर दी। इसमें से एक गोली उनके बाएं की हाथ कलाई में लग गई। गैंग्रीन को खतरे को देखते हुए कुंवर सिंह ने अपने दाएं हाथ से तलवार निकालकर अपने बाएं हाथ को कोहनी तक काट दिया था। उन्होंने कटे हुए हाथ को गंगा नदी को समर्पित कर दिया था।
1858 में जीता आखिरी युद्ध
क्रांति के दौरान वह दिसंबर में लखनऊ पहुंच गए थे और यहां वह अन्य क्रांतिकारियों से मिले। हालांकि, बाद में वह अपने गांव की तरफ निकल पड़े और 23 अप्रैल को जगदीशपुर के पास उनका युद्ध अंग्रेजी सेना से हुआ, जिसका नेतृत्व कैप्टन ली ग्रेन्ड कर रहे थे। इस युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता दिखाई और अंग्रेजी सेना को हरा दिया था। इस बीच कैप्टन ली ग्रेन्ड भी मारा गया।
26 अप्रैल, 1858 को हुआ निधन
कुंवर सिंह युद्ध को जीत गए थे, लेकिन इस दौरान उनका कटा हुआ हाथ उनके लिए परेशानी का कारण बन रहा था। उनके हाथ का घाव ठीक नहीं हुआ और खून बहता रहा। ऐसे में युद्ध को जीतने के तीन दिन बार 26 अप्रैल, 1858 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके अदम्य साहस और वीरता को देखते हुए अंग्रेजों ने उन्हें यह उपाधि दी थी।
