भारत में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की नीति (E-20) के कारण एथेनॉल इन दिनों काफी चर्चा में बना हुआ है। E-20 एथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण आगे आने वाले वर्षों में तेल के आयात पर देश की निर्भरता भी कम हो सकती है। इसी बीच एक बड़ा सवाल अक्सर सामने आता है कि आखिर देश में सबसे ज्यादा एथेनॉल किस राज्य में बनता है? आइए भारत के टॉप-3 एथेनॉल उत्पादक राज्यों और इस उद्योग से जुड़े फैक्ट्स के बारे में जानते हैं।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक
यदि वास्तविक उत्पादन (Actual Production) की बात करें तो उत्तर प्रदेश देश में सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक राज्य है। एथेनॉल सप्लाई के मामले में इसने महाराष्ट्र को पीछे छोड़ दिया है। उत्तर प्रदेश सिर्फ अपने राज्य की जरूरतें पूरी नहीं करता, बल्कि दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे राज्यों को भी एथेनॉल सप्लाई करता है।
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2 अरब लीटर तक उत्पादन हर साल
यूपी में करीब 75 डिस्टिलरी काम कर रही हैं जो अधिकांश रूप से चीनी मिलों से जुड़ी हुई हैं। यहां गन्ने के रस, B-हेवी और C-हेवी मोलासेस से बड़े पैमाने पर एथेनॉल तैयार होता है। बताते चलें कि पिछले आठ वर्षों में, राज्य ने अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 2 अरब लीटर प्रति वर्ष कर लिया है।
उत्पादन क्षमता में महाराष्ट्र अब भी नंबर-1
भले ही वास्तविक उत्पादन में उत्तर प्रदेश आगे निकल चुका हो, लेकिन स्थापित उत्पादन क्षमता (Installed Capacity) के मामले में महाराष्ट्र अभी भी देश में पहले स्थान पर बना हुआ है। राज्य में लगभग 127 एथेनॉल प्लांट हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता करीब 268 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष है। यहां का एथेनॉल उद्योग मजबूत सहकारी चीनी मिलों के नेटवर्क पर आधारित है।
कर्नाटक भी तेजी से बढ़ा रहा अपनी हिस्सेदारी
एथेनॉल उत्पादन की दौड़ में कर्नाटक भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य में गन्ना आधारित उद्योग के साथ-साथ मक्का और अन्य अनाज से भी एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
नई डिस्टिलरी, आधुनिक तकनीक और सरकारी प्रोत्साहन की बदौलत कर्नाटक लगातार अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है।
अब सिर्फ गन्ना नहीं, मक्का और चावल भी बन रहे हैं बड़ी ताकत
कुछ साल पहले तक भारत का एथेनॉल उद्योग लगभग पूरी तरह गन्ने पर निर्भर था। लेकिन सरकार ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति में बदलाव कर मक्का, अतिरिक्त चावल और अन्य अनाज से भी एथेनॉल बनाने को बढ़ावा दे रहा है। इस बदलाव का असर साफ दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025-26 में देश में पेट्रोल में मिलाए गए एथेनॉल का बड़ा हिस्सा अनाज आधारित स्रोतों से आया।
एथेनॉल मिशन से किसानों को क्या है फायदा
एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसानों की फसलों को नया बाजार मिल रहा है। गन्ने के साथ-साथ मक्का और चावल उगाने वाले किसानों की आय बढ़ने की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं।
वहीं दूसरी ओर पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से विदेशी तेल पर खर्च घट रहा है, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है और प्रदूषण कम करने में भी मदद मिल रही है। आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य भारत के स्वच्छ ऊर्जा मिशन में अहम भूमिका निभा सकते है।
