आपने भारत के जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के बारे में जरूर सुना या पढ़ा होगा। यह भारत के साथ-साथ एशिया का पहला नेशनल पार्क भी है, जो कि उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल और नैनीताल क्षेत्र में आता है। इस नेशनल पार्क का नाम इतिहास में दो बार बदल चुका है और आखिर में इसका नाम जिम कॉर्बेट के ऊपर रखा गया है। लेकिन, यहां सवाल है कि आखिर जिम कॉर्बेट थे कौन ? और भारत का यह नेशनल पार्क आखिर उनके नाम पर ही क्यों है ? इन सभी सवालों का जवाब जानने के लिए यह पूरा लेख पढ़ें।
कौन थे जिम कॉर्बेट
जिम कॉर्बेट का पूरा नाम Edward James Corbett था। वह ब्रिटिश मूल के एक प्रसिद्ध भारतीय शिकारी, पर्यावरणविद, लेखक और संरक्षणवादी थे। उनका जन्म 25 जुलाई 1875 को उत्तराखंड के नैनीतालमें हुआ था। कॉर्बेट को लेकर खास बात यह है कि उनकी पहचान एक ऐसे इंसान के रूप में होती है, जिन्होंने अपना आधा जीवन आदमखोर शेरों और तेंदुओं के शिकार में बिताया, जबकि आधा जीवन उन्हीं शेरों और जंगलों के संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया था।
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शिकारी के तौर पर क्यों थी पहचान
उत्तराखंड में साल 1900 से लेकर 1930 के दशक के दौरान कुमाऊं और गढ़वाल की पहाड़ियों में नरभक्षी शेर और तेंदुओं का भारी आतंक था। कॉर्बेट ने 33 से अधिक आदमखोर जानवरों का शिकार किया था, जिन्होंने मिलकर 1,200 से अधिक ग्रामीणों की जान ली थी। इसमें प्रसिद्ध चंपावत की आदमखोर बाघिन भी शामिल थी, जो कि 436 मौतों के लिए जिम्मेदार थी और रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ भी शामिल था।
शौक के तौर पर नहीं करते थे शिकार
कॉर्बेट के बारे में कहा जाता है कि वह कभी भी शौक के तौर पर जानवरों का शिकार नहीं करते थे, बल्कि सिर्फ उन्हीं शेरों को मारते थे, जो इंसानों के लिए खतरा बन चुके होते थे।
कैसे हुई संरक्षण की शुरुआत
कॉर्बेट ने बहुत लंबा समय जंगलों में बिताया था। इस दौरान उन्होंने महूसस किया कि जंगलों की कटाई और अवैध शिकार से शेरों की संख्या तेजी से घट रही है। इसके बाद उन्होंने हथियार छोड़ हाथों में कैमरा पकड़ लिया था। वह भारत में वन्यजीव संरक्षण और बाघ बचाओ अभियानों के शुरुआती व्यक्तियों में से एक रहे हैं।
कैसे बना एशिया का पहला नेशनल पार्क
उत्तराखंड के नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित यह पार्क एशिया का पहला नेशनल पार्क है। इस पार्क की स्थापना 1936 में जिम कॉर्बेट और संयुक्त प्रांत (UP) के तत्कालीन गवर्नर सर विलियम माल्कम हेली के प्रयासों से भारत और एशिया के पहले नेशनल पार्क के रूप में हुई थी। उस समय इसका नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था।
पार्क का नाम हुआ रामगंगा नेशनल पार्क
साल 1954-55 के दौरान इस पार्क से बहने वाली प्रमुख नदी 'रामगंगा' के नाम पर इसका नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क कर दिया गया था।
ऐसे पड़ा जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क
साल 1955 में केन्या में जिम कॉर्बेट का निधन हो गया था। ऐसे में साल 1956 में वन्यजीव संरक्षण में उनके अतुलनीय योगदान को सम्मानित करने के लिए पार्क का नाम बदलकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया था।
पार्क से हुई प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत
साल 1973 में भारत सरकार ने देश में बाघों को विलुप्त होने से बचाने के लिए "प्रोजेक्ट टाइगर" की शुरुआत की थी। इस ऐतिहासिक वन्यजीव संरक्षण परियोजना की शुरुआत इसी जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से की गई थी।
जिम कॉर्बेट की प्रमुख पुस्तकें
जिम कॉर्बेट ने कुमाऊं के जंगलों और अपने अनुभवों पर आधारित कई प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं, जो आज भी बेस्टसेलर हैं:
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Man-Eaters of Kumaon (1944)
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The Man-Eating Leopard of Rudraprayag (1947)
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My India (1952)
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Jungle Lore (1953)
