उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर का जिक्र जब भी होता है, तब-तब जहन में यहां के नवाब, कबाब और ऊर्दू भाषा की मिठास उतर जाती है। लखनऊ एक ऐसा शहर है, जहां चिकन पहना भी जाना जाता है और चिकन खाया भी जाता है। कहने का मतलब है कि यहां की चिकनकारी वाला कपड़ा विश्व प्रसिद्ध है, जो कि सफेद कपड़े पर देखने को मिलती है।
हम लखनऊ को जब भी लिखते हैं, तो इसकी स्पेलिंग Lucknow लिखते हैं, जबकि उच्चारण के मुताबिक, इसकी स्पेलिंग Lakhnau होनी चाहिए। ऐसे में क्या है इसके पीछे का कारण, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
कहां से आया लखनऊ का नाम?
सबसे पहले हम लखनऊ के नाम के बारे में जान लेते हैं। भारतीय पर्यटन मंत्रालय के मुताबिक, लखनऊ का इतिहास रामायण काल से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं की मानें, तो भगवान श्रीराम जब लंका विजयी होने के बाद अयोध्या लौटे, तो उन्होंने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को यह क्षेत्र उपहार स्वरूप दिया। बाद में यहां एक शहर बसा, जिसे लक्ष्मणपुरी या लक्ष्मणवती कहा जाता था।
आज भी शहर में लक्ष्मण टीला मौजूद है। बाद में अवधी भाषा के प्रभाव की वजह से इसका नाम लक्ष्मणपुरी से बदलकर लखनपुर हो गया और फिर धीरे-धीरे यह लखनावती और बाद में यह लखनऊ हुआ।
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इतिहासकारों का यह भी है मत
कुछ इतिहासकारों का लखनऊ के नाम को लेकर अलग मत है। उनका मानना है कि शहर का नाम धन की देवी लक्ष्मी के नाम पर ‘लक्ष्मीनावती’ था, जो कि बाद में लखनऊ हुआ। वहीं, एक अन्य इतिहास पर गौर करें, तो 11वीं और 12वीं शताब्दी में यहां एक राजा लखन पासी हुआ करते थे, जिनके नाम पर शहर का नाम लखनऊ हो गया।
Lucknow की स्पेलिंग क्यों नहीं होती Lakhnau
लखनऊ की स्पेलिंग के पीछे यहां का औपनिवेशिक काल छिपा हुआ है। दरअसल, जब अंग्रेज 18वीं शताब्दी में अवध क्षेत्र पहुंचे, तो उन्होंने इसे अपने लहजे में बोलना शुरू किया। क्योंकि, अंग्रेज शुरू से ही भारत के कई शहरों के नाम को उनके मूल नाम के रूप में नहीं बोल पाते थे। वे उधगमंडलम को ‘ऊटी’ बोला करते थे, तो कानपुर को Cawnpore बोलते थे।
इसी प्रकार, जब उन्होंने लखनऊ सुना, तो वे इसे ठीक तरह से नहीं बोल सके और ‘लकनऊ’ बोला। उस समय सरकारी दफ्तर और रेलवे का अधिकार अंग्रेजों के पास ही था, ऐसे में उन्होंने अंग्रेजी में इसे Lucknow लिखा। तब से सभी जगहों पर पर लखनऊ की यही स्पेलिंग लिखी जाने लगी और आज देश के आजाद होने के बाद भी लखनऊ को अंग्रेजों द्वारा दी गई स्पेलिंग में ही लिखा जाता है।
आज भी नहीं बदली है तहजीब
लखनऊ को लेकर खास बात यह है कि बेशक इसके लिखने का तरीका बदला है, लेकिन आज भी अवध की वह पुरानी तहजीब यहां के लोगों में बसती है। यहां की भाषा में उर्दू की मिठास और अपने से पहले सामने वाले को रखना यह दिखाता है कि लखनऊ की संस्कृति और यहां की तहजीब आज भी पुराने खाके में ढलकर ही बन रही है।
