क्या आपने भी बचपन में डाबर च्यवनप्राश खाया है? यदि हां, तो आपको बता दें कि यह उस कंपनी का उत्पाद है, जिसकी शुरुआत कोलकाता में एक छोटी सी क्लीनिक से हुई थी। समय के साथ कंपनी ने आयुर्वेद को विज्ञान से जोड़कर नई पीढ़ी के बीच में पकड़ बनाई और आज रियल जूस से लेकर डाबर लाल मंजन, डाबर आंवला तेल और डाबर हनी से खुद को स्थापित कर लिया।
1884 में हुई थी शुरुआत
कंपनी की शुरुआत कोलकाता की गलियों में 1884 में हुई थी। इसे शुरू करने वाले डॉ. एस. के. बर्मन थे, जो पेशे से एक Physician थे। उस समय बंगाल में हैजा, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियां फैल रही थीं। ऐसे में डॉक्टर ने आम लोगों को सस्ती और यूजफूल आयुर्वेदिक दवाइयां देने की ठानी।
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1896 में खुली कंपनी
डॉ. बर्मन ने अपनी कंपनी की शुरुआत डॉक्टर के ‘डा’ और बर्मन से ‘बर’ से की। उन्होंने इसे मिलाकर डाबर नाम रखा। समय के साथ 'डाबर पेप्सिन' और 'डाबर पुदीन हरा' की मांग बढ़ी, जिससे कंपनी ने 1896 में अपनी पहली यूनिट खोली।
1919 में रिसर्च पर दिया जोर
डाबर पहली ऐसी कंपनी थी, जिसने 1919 में आयुर्वेदिक दवाओं के बड़े पैमाने पर निर्माण के लिए रिसर्च के लिए लैब स्थापित की। वहीं, कंपनी ने 1972 में बंगाल बने राजनीतिक कारण से साहिबाबाद में अपना हेडक्वार्टर बना लिया। साल 1986 में यह एक लिस्टेड कंपनी बन गई।
कंपनी के कौन-कौन से ब्रांड
कंपनी के पास बहुत-से ब्रांड मौजूद हैं, जो कि बाजार में अच्छी खासी पहचान रखते हैंः
-डाबर च्यवनप्राश
-डाबर आंवला हेयर ऑयल
-डाबर लाल दंत मंजन व पेस्ट
-रियल जूस
-डाबर हनी
-डाबर पुदीन हरा
-डाबर ग्लूकोज
-डाबर वाटिका
-डाबर गुलाबरी
-डाबर बबूल
-ओडोनिल
-ओडोमोस
-सैनिफ्रैश
आज है 90,000 करोड़ से अधिक की कंपनी
आज डाबर कंपनी अलग-अलग सेगमेंट है और 120 से अधिक देशों में अपने उत्पाद बेच रही है। इसके उत्पाद सबसे अधिक मध्य एशिया और अफ्रीका में बिकते हैं। वहीं, डाबर कंपनी की मार्केट कैप 90,000 करोड़ रुपये से अधिक है। बर्मन परिवार अब इसके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल हैं, जबकि CEO की जिम्मेदारी पेशेवरों को दे रखी है।
