आज भारत के करोड़ों घरों में Maxo और Ujala इस्तेमाल किया जाता है। इसका श्रेय केरल के एमपी रामचंद्रन को जाता है, जिन्होंने उधार के 5,000 रुपये से कंपनी की शुरुआत की थी। कपड़ो को ज्यादा चमकदार बनाने के उनके आइडिया ने उनकी कंपनी को आज हजारों करोड़ रुपये की कंपनी बना दिया है। कुछ समय बाद उन्होंने अपना मैक्सो ब्रांड भी निकाला, जिसने बाजार में पहले से मौजूद कई बड़े ब्रांड को पीछे छोड़ दिया है।
अकाउंटेंट के रूप में शुरू किया काम
एमपी रामचंद्रन का जन्म केरल में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक अकाउंटेंट के रूप में काम शुरू किया। हालांकि, उनके मन में अपना कुछ काम करने की इच्छा रहती थी। ऐसे में वह अलग-अलग आइडिया के बारे में सोचते रहते थे।
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रसोई को बनाया प्रयोगशाला
रामचंद्रन शुरू से ही अपने कपड़े खुद धोते थे, हालांकि वह अपने कपड़ों की चमक से संतुष्ट नहीं थे। इस वजह से उन्होंने अपने एक जर्नल में नीली डाई के बारे में पढ़ा, जो कि सफेद कपड़ों को चमकदार बनाने में असरदार थी। इसके बाद उन्होंने अपनी रसोई को ही प्रयोगशाला बना दिया और नए-नए प्रयोग करते गए। वह तब तक प्रयोग करते गए, जब तक उनके हाथ कामयाबी नहीं लग गई।
1983 में शुरू की कंपनी
रामचंद्रन को जब फॉर्मूला मिल गया, तो उन्होंने अपने भाई से 5 हजार रुपये उधार लेकर अपने पहली बेटी ज्योति के नाम पर ज्योति लैब्स नाम से कंपनी खोल दी। शुरुआत में उन्हें बाजार में खुद को स्थापित करने में परेशानी का सामना करना पड़ा।
इस तकनीक से हासिल की सफलता
शुरुआत में उजाला को घर-घर तक पहुंचाने के लिए 5 महिलाएं रखी गईं, जो कि घर-घर जाकर उजाला फैब्रिक व्हाइटनर के बारे में लोगों को समझाने के साथ डेमो भी देती थीं। इसके बाद लोगों में उजाला को लेकर विश्ववास बढ़ा और 1990 के दशक तक यह दक्षिण भारत से निकलकर पूरे भारत में लोकप्रिय हो गया।
Maxo, Pril, Exo और Margo किया स्थापित
कंपनी ने बाद में उजाला के साथ-साथ अन्य कंपनियां भी स्थापित कीं, जिनमें मैक्सो कंपनी को 35 करोड़ रुपये के निवेश के साथ शुरू किया गया। वहीं, बर्तनों की धुलाई में इस्तेमाल होने वाले प्रिल, एक्सो और नहाने का साबुन मार्गो भी उनके द्वारा लांच किया गया। आज यह कंपनी सालाना तौर पर करीब 3011 करोड़ रुपये का बिजनेस कर रही है, जिसमें कंपनी का शुद्ध मुनाफा करीब 333 करोड़ रुपये है।
