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कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष

8वीं सदी के दौरान, कन्नौज पर नियंत्रण के लिए भारत के तीन प्रमुख साम्राज्यों जिनके नाम पालों, प्रतिहार और राष्ट्रकूट थे, के बीच संघर्ष हुआ। पालों का भारत के पूर्वी भागों पर शासन था जबकि प्रतिहार के नियंत्रण में पश्चिमी भारत (अवंती-जालौर क्षेत्र) था। राष्ट्रकूटों ने भारत के डक्कन क्षेत्र पर शासन किया था। इन तीन राजवंशों के बीच कन्नौज पर नियंत्रण के लिए हुए संघर्ष को भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के रूप में जाना जाता है।

मौर्य साम्राज्य: प्रशासन

शाही राजधानी पाटलिपुत्र के साथ मौर्य साम्राज्य चार प्रांतों में विभाजित था। अशोक के शिलालेखों से प्राप्त चार प्रांतीय राजधानियों के नाम, तोसली (पूर्व में), उज्जैन (पश्चिम में), स्वर्णागिरी (दक्षिण में) और तक्षशिला (उत्तर में) थे। संरचना के केंद्र में कानून बनाने की शक्ति राजा के पास होती थी। जब वर्णों और आश्रमों पर आधारित सामाजिक व्यवस्था (जीवन चक्र) समाप्त होती थी तो तब कौटिल्य राजा को धर्म का प्रचार करने की सलाह देता था।

उत्तर वैदिक काल (1000 - 600 ई.पू.)

उत्तर वैदिक काल के दौरान आर्यों का यमुना, गंगा और सदनीरा के सिंचिंत उपजाऊ मैदानों पर पूर्ण नियंत्रण था। उन्होंने विंध्य को पार कर लिया था और गोदावरी के उत्तर में, डेक्कन में जा बसे थे। उत्तर वैदिक काल के दौरान लोकप्रिय सभाओं का महत्व समाप्त हो गया था एवं इसकी कीमत उन्हें शाही सत्ता की वृद्धि के रूप में चुकानी पड़ी थी। दूसरे शब्दों में कहें तो साम्राज्य के लिए राजशाही का रास्ता साफ हो चुका था। बड़े राज्यों के गठन से राजा और अधिक शक्तिशाली हो गया था।

कनिष्क: कुषाण राजवंश (78 ईस्वी - 103 ईस्वी)

कनिष्क कुषाण साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक था। उसके साम्राज्य की राजधानी पुरूषपुर (पेशावर) थी। उसके शासन के दौरान, कुषाण साम्राज्य उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान से लेकर मथुरा और कश्मीर तक फैल गया था। रबातक शिलालेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार कनिष्क विम कदफिसेस का उत्तराधिकारी था जिसने  कुषाण राजाओं की एक प्रभावशाली वंशावली स्थापित की।

मध्य एशियाई संपर्कों का प्रभाव (शक-कुषाण काल के दौरान)

शक और कुषाण अवधि के दौरान घुड़सवार सेना का बेहतरीन उपयोग देखने को मिला था। घोड़े  की लगाम और पीठ पर सीट के प्रयोग की शुरूआत शकों और कुषाणों द्वारा शुरू की गयी थी। इसके अलावा शक और कुषाणों ने अंगरखा,  पगड़ी और पतलून तथा भारी-भरकम लंबे कोट,  कैप और  हेलमेट की शुरूआत की थी तथा इस अवधि के दौरान जूतों की भी शुरूआत हुई थी जो युद्ध में जीत के लिए मददगार साबित हुए थे।

समुद्र और घाटियों के मार्गों के माध्यम से व्यापार करने के लिए केंद्रीय क्षेत्रों को खोल दिया गया था। इन मार्गों में से एक पुराने रेशम मार्ग के लिए प्रसिद्ध हो गया था।

मौर्य युग के पूर्व विदेशी आक्रमण

भारतीय उप-महाद्वीप के दो प्रमुख विदेशी आक्रमण, 518 ई.पू. में ईरानी आक्रमण और 326 ई.पू. में मकदूनियाई आक्रमण थे। इन दो आक्रमणों ने इंडो ईरानी व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा दिया। ईरानी लेखकों ने खरोष्ठी लिपि की शुरूआत की जिसे बाद में अशोक के कुछ शिलालेखों में प्रयोग किया गया। इस लिपि में अरबी की तरह दांये से बांये की तरफ लिखा जाता था।

गुप्त काल के बाद आर्थिक, सामाजिक जीवन और मंदिर वास्तुकला

गुप्ताओं के पतन के बाद, उनके गृह प्रांतों में शासकों की एक लंबी लाइन लग गयी थी। एक को छोडकर इन सभी के नामों के अंत में गुप्त आता था। इसलिए यह परिवार इतिहास में “मगध के शासन के बाद  गुप्त”  के नाम से जाना जाता है। यह तय कर लेना कि वे किसी भी तरह से शाही गुप्त के साथ जुड़े हुए थे, संभव नहीं था। गुप्त काल के बाद उत्तरी भारत में कुछ महत्वपूर्ण राजवंश उत्पन्न हुए। जैसे-कन्नौज के मौखरी, कामरूप के वर्मन, थानेश्वर के पुष्यभूति आदि।

भारत का प्राचीन दर्शन-शास्त्र

भारत में दर्शन- शास्त्र के छः विद्यालयों का विकास ईस्वी युग के शुरुआत के साथ ही हो गया था | ये निम्न इस प्रकार थे: 1) योग, 2) न्याय, 3) मीमांसा, 4) वेदांता, 5) वैशेशिखा, 6) संख्या | इन छः सिद्धांतों की सही औपचारिक तिथि पता नहीं है | इन छः प्रणालियों के बनने की सही तिथि पता नहीं हैं क्यूंकि  तब तक लिखावट के ना बनने से इनका अध्ययन पूरी तरह मौखिक है |हालांकि इनकी शुरुआत लगभग 2000 -3000 या इससे ज्यादा  साल पहले हुई | कुछ दर्शन शास्त्री कहते हैं कि इनकी जड़ें 5000-10000 साल या उससे भी पहले की हैं |

बौद्ध के युग में प्रशासनिक ढाँचा व सामाजिक जीवन (563- 483 B C )

बौद्ध धर्म ने गैर- वैदिक क्षेत्र के लोगों से विशेष अपील की जहाँ की अछूती धरती परिवर्तन के लिए तैयार थी | बौद्ध धर्म ने वर्ण प्रथा पर वार किया ताकि उन्हें निम्न जाति का समर्थन मिल सके |

लोगों को बिना उनकी जाति को महत्व देते हुए बौद्ध क्रम  में लिया गया | महिलाओं को भी संघ में सम्मलित किया गया तथा उन्हें पुरुषों के बराबर लाया गया | ब्राह्मणवाद के तुलना में बौद्ध धर्म उदार तथा प्रजातांत्रिक था |

चोल, चेरा और पाण्ड्या राजवंश

तमिल देश पर संगम काल के समय में चेरा, चोल व पाण्ड्या नामक तीन राजवंश द्वारा  शासन किया गया | चेरा राजवंश ने दो विभिन्न कालों में शासन किया | प्रथम चेरा राजवंश ने संगम काल में शासन किया जबकि द्वितीय चेरा राजवंश ने 9वीं शताब्दी A D के आगे शासन किया |संगम काल के चोल राज्य का विस्तार  आधुनिक तिरुचि जिले से आंध्र प्रदेश तक हुआ |तमिल नाडु में स्थित पाण्ड्या राज्य ने लगभग  6वीं शताब्दी B C के दौरान राज किया और लगभग 15वीं शताब्दी A D में समाप्त हो गया |

चोल साम्राज्य ( 9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : बाद के चोल

बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |

चोल राज्य : प्रशासन, कला और वास्तु-कला

चोल वंश प्रमुख रूप से तमिल वंश था जिन्होने मुख्यतः भारत के दक्षिण में 13वीं सदी तक शासन किया | सभी शासकों में ,करिकला चोल आरंभिक चोल राजाओं में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध थे | चोल वंश के पास पीतल के कुछ बेहतरीन नमूने तथा अन्य मूर्तियाँ हैं जैसे नाचते हुए नटराज की मूर्ति और तंजावुर ( तमिलनाडु) का बृहदीस्वरर मंदिर इन्हीं के कुछ बेहतरीन उदाहरण हैं |

आर्यों का आगमन

इंडो आर्यन भाषा बोलने वाले लोग उत्तर- पश्चिमी पहाड़ों से आये थे तथा पंजाब के उत्तर पश्चिम में बस गए तथा बाद में गंगा के मैदानीय इलाकों में जहाँ इन्हे आर्यन् या इंडो- आर्यन् के नाम से जाना गया | ये लोग इंडो- ईरानी, इंडो- यूरोपीय या संस्कृत भाषा बोलते थे | आर्यन की उत्पत्ति के बारे में सही जानकारी नहीं है, इस पर अलग अलग विद्वानो के अलग विचार हैं | ये कहा गया है कि आर्यन्स अल्प्स के पूर्व( यूरेशिया), मध्य एशिया, आर्कटिक क्षेत्र, जर्मनी तथा दक्षिणी रूस में रहे |

आर्यन्स का भारत में आगमन

इंडो आर्यन भाषा बोलने वाले लोग उत्तर- पश्चिमी पहाड़ों से आये थे तथा पंजाब के उत्तर पश्चिम में बस गए तथा बाद में गंगा के मैदानीय इलाकों में जहाँ इन्हे आर्यन्सया इंडो- आर्यन्स के नाम से जाना गया | ये लोग इंडो- ईरानी, इंडो- यूरोपीय या संस्कृत भाषा बोलते थे | ये कहा गया है कि आर्यन्स अल्प्स के पूर्व( यूरेशिया), मध्य एशिया, आर्कटिक क्षेत्र, जर्मनी तथा दक्षिणी रूस में रहे | आर्यन्स भारत में प्रारंभिक वैदिक युग में बसे | इसे सप्तसिन्धु या सात नदियों; झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलुज, सिंधु और सरस्वती की धरती के नाम से जाना जाता है |

अशोक द ग्रेट( 268- 232 B .C.)

अशोक बिंदुसार का बेटा था | अपने पिता के शासन के दौरान वह तक्षिला और उज्जैन का राज्यपाल था | अपने भाइयों को सफलतापूर्वक हराने के बाद अशोक 268 B . C . के लगभग सिंहासन पर बैठा | अशोक के राजगद्दी पर पद ग्रहण(273 B . C .) तथा उसके वास्तविक राज्याभिषेक( 268 B .C.) में चार साल का अन्तराल था | अतः, उपलब्ध साक्ष्यों से यह पता चलता है कि बिंदुसार की मृत्यु के बाद राजगद्दी के लिए संघर्ष हुआ था |

दिल्ली सल्तनत: कला, शिक्षा और व्यापार

दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत कला, शिक्षा और व्यापार शैली में एक अद्भुत हिंदू और इस्लामी शैली का मिश्रण दृष्टिगोचर होता है.

दिल्ली सल्तनत: सामाजिक आर्थिक संरचना

दिल्ली सल्तनत के दौरान व्यापार में काफी वृद्धि हुई थी. मुद्रा के रूप में चांदी का टंका प्रचालन में था.

राजपूत: सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएं

राजपूतों की मूल भाषा प्राकृत थी. जोकि थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ क्षेत्रीय भाषाओं से अलग था.

राजपूत काल: महत्वपूर्ण घटनाक्रम

राजपूत राज्य अपनी वीरता की वजह से भारत में मुस्लिम वर्चस्व के  ख़िलाफ मुख्य बाधा के रूप में विद्यमान थे.

राजपूत वास्तुकला

राजपूत शासक खूबसूरत मंदिरों, किलों और महलों के निर्माण के सन्दर्भ में एक गहरी अंतर्दृष्टि रखते थे.

बहमनी साम्राज्य

बहमनी साम्राज्य, मध्यकालीन भारत का मुस्लिम साम्राज्य था जिसका विस्तार दक्षिण भारत के दक्कन में था.

तालीकोटा की लड़ाई (1565 ईस्वी)

तालीकोटा की लड़ाई 26 जनवरी 1565 ईस्वी को दक्कन की सल्तनतों और विजयनगर साम्राज्य के बीच लड़ा गया था.

कृष्ण देव राय: (1509-1529 ईसवी)

कृष्ण देव राय विजयनगर साम्राज्य का सबसे प्रभावशाली शासक था| इसका संबंध तुलुवा वंश से था|

विजयनगर साम्राज्य: तुलुवा वंश

यह विजयनगर साम्राज्य का तीसरा वंश था I इस साम्राज्य का सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्ण देव राय इसी वंश से संबंधित था I

विजयनगर साम्राज्य: सलुव राजवंश

यह विजयनगर साम्राज्य पर राज करने वाला दूसरा राजवंश था.

विजयनगर साम्राज्य (1336ईस्वी-1646ईस्वी): एक परिचय

विजयनगर साम्राज्य पर चार राजवंशों ने शासन कार्य किया था- संगम राजवंश, सलुव राजवंश, तुलुव राजवंश और आरविडू राजवंश.

विजयनगर साम्राज्य: संगम राजवंश

संगम राजवंश, विजयनगर पर शासन करने वाला पहला वंश था.

उत्तरवर्ती मुगल शासक

औरंगजेब मुगल साम्राज्य का अंतिम महान शासक था. उसकी मृत्यु के पश्चात जितने भी मुग़ल शासक मुग़ल सिहांसन पर बैठे वे सभी उत्तरवर्ती मुग़ल के रूप में जाने जाते हैं.

शिवाजी के बाद मराठे

शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र, संभाजी मराठों के राजा बने. उन्होंने मुगल प्रदेशों पर हमले जारी रखा.

शिवाजी और मुगल

दक्कन में अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के बाद, शिवाजी नें मुगल प्रदेशों की ओर ध्यान दिया.

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