दिल्ली हाई कोर्ट ने 08 अगस्त 2018 को राष्ट्रीय राजधानी में भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है.
हाई कोर्ट ने कहा कि इस काम के लिए लोगों को दंडित करने के प्रावधान असंवैधानिक हैं और इसे रद्द किया जाना चाहिए. हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि भीख मांगना अब अपराध नहीं होगा.
हाईकोर्ट की कार्यकारी चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी हरि शंकर की पीठ ने मामले की सुनवाई की.
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से संबंधित मुख्य तथ्य:
- दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले के सामाजिक और आर्थिक पहलू पर अनुभव आधारित विचार करने के बाद दिल्ली सरकार भीख के लिए मजबूर करने वाले गिरोहों पर काबू के लिए वैकल्पिक कानून लाने को स्वतंत्र है.
- कोर्ट ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि यदि कोई सुनियोजित ढंग से भिखारियों का गैंग या रैकेट चलाता है तो उस पर कार्रवाई की जाना चाहिए.
- हाईकोर्ट ने कहा कि इस फैसले का अपरिहार्य नतीजा यह होगा कि इस अपराध के कथित आरोपी के खिलाफ मुंबई के भीख मांगना रोकथाम कानून के तहत लंबित मुकदमा रद किया जा सकेगा.
- कोर्ट ने 16 मई को पूछा था कि ऐसे देश में भीख मांगना अपराध कैसे हो सकता है जहां सरकार भोजन या नौकरियां प्रदान करने में असमर्थ है.
- कोर्ट ने कहा कि किसी भी भूखे व्यक्ति को‘’राइट टू स्पीच‘’के तहत रोटी मांगने का अधिकार है.
पहले कठोर सजा का प्रावधान:
पहले भीख मांगते हुए अगर कोई भी शख्स पकड़ा जाता था तो उसे 1 से 3 साल की सजा का प्रावधान था, जो अब खत्म कर दी गई है. भिखारी के दूसरी बार पकड़े जाने पर उसको 10 साल तक की सजा का प्रावधान था.
पृष्ठभूमि:
हर्ष मंदर और कर्णिका साहनी की ओर से अदालत में यह जनहित याचिका दायर की गई थी और अदालत से मांग की थी कि भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के अलावा राष्ट्रीय राजधानी में भिखारियों को आधारभूत मानवीय और मौलिक अधिकार दिए जाएं.
केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार ने अक्टूबर 2016 में दिल्ली हाई कोर्ट में कहा था सामाजिक न्याय मंत्रालय भीख मांगने को अपराध की श्रेणी के बाहर करने और उनके पुनर्वास को लेकर मसौदा तैयार कर रही है.
Comments
All Comments (0)
Join the conversation