भारत में अंग्रेजों के समय क्या होती थी रैयतवाड़ी व्यवस्था, विस्तार से पढ़ें
अंग्रेजों के समय लगान वसूली के लिए रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की गई थी। इसके तहत ब्रिटिश और किसानों के बीच जमींदारों को हटा दिया गया था और सीधा संपर्क किसानों से हुआ था। अब किसान ही अपनी जमीन के मालिक थे, जो कि ब्रिटिश खजाने में लगान चुकाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा हर 20 से 30 साल में जमीन की उर्वता और फसलों की समीक्षा की जाती थी।
भारत में अंग्रेजों के समय किसानों को लेकर अलग-अलग व्यवस्था लागू की गई थी। इनमें से एक रैयतवाड़ी व्यवस्था थी। इस व्यवस्था के तहत किसानों से लगान लिया जाता था। हालांकि, किसानों को अधिक लगान देना होता था, जिस वजह से कई बार किसान लगान चुकाने में असमर्थ होते थे और उन्हें बड़े साहूकारों से कर्ज लेना होता था।
इस बीच कई बार उनकी जमीनें बड़े साहूकारों के हाथ में चली जाती थी। इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर रैयतावड़ी व्यवस्था भारत में कब, कहां और किसने लागू की थी।
कब लागू हुई थी रैयतवाड़ी व्यवस्था
सबसे पहले हम ‘रैयत’ शब्द का अर्थ समझ लेते हैं। आपको बता दें कि ‘रैयत’ शब्द का अर्थ किसान होता है। इस व्यवस्था की शुरुआत 1792 में कैप्टन अलेक्जेंडर रीड ने मद्रास के बारामहल जिले से की थी। हालांकि, इस व्यवस्था का विस्तार 1820 में थॉमस मुनरो द्वारा किया गया था, जिसने पूरी मद्रास प्रेसीडेंसी में इसे लागू किया था।
भारत में कहां-कहां लागू थी रैयतवाड़ी व्यवस्था
रैयतवाड़ी व्यवस्था उस समय भारत के करीब 51 फीसदी भू-भाग पर लागू की थी। इसमें बांबे, मद्रास और असम के कुछ हिस्सों को मिलाकर कर्नाटक के कूर्ग में भी इसे लागू किया गया था।
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क्या थी रैयतवाड़ी व्यवस्था
रैयतवाड़ी व्यवस्था से पहले जमींदारी प्रथा हुआ करती थी, जिसमें जमींंदार को किसानों की भूमि का मालिक बना दिया जाता था। वह किसानों से लगान लेकर ब्रिटिश को लगान देता था। वहीं, इस रैयतवाड़ी व्यवस्था में किसानों और ब्रिटिश के बीच से जमींदारों को हटा दिया गया था और सीधा संबंध किसानों से हुआ था। किसान जब तक ब्रिटिश को लगान देते थे, उन्हें उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया जाता था।
20 से 30 वर्षों में होती थी समीक्षा
जमींदारी प्रथा पूरी तरह स्थायी थी, लेकिन रैयतवाड़ी व्यवस्था स्थायी नहीं थी। इस व्यवस्था में मिट्टी की उर्वरता और फसलों की गुणवत्ता को देखते हुए 20 से 30 सालों में समीक्षा की जाती थी और लगान दर तय होती थी।
किसानों को होता था नुकसान
रैयतवाड़ी व्यवस्था में भी ब्रिटिश कंपनी ने कठोर रवैया अपनाया हुआ था। यदि बारिश या फिर अन्य कारण से किसानों की फसल बर्बाद हो जाती थी, तब भी ब्रिटिश द्वारा किसानों से लगान लिया जाता था। ब्रिटिश किसी भी स्थिति में लगान माफ नहीं करते थे। ऐसा न करने पर वह किसानों को जमीन से बेदखल कर दिया करते थे। इसस बचने के लिए किसानों द्वारा साहूकारों से कर्ज लिया जाता था और वे कर्ज के जाल में फंसकर अपनी जमीनों को साहूकारों के हाथ में दे देते थे।
निष्कर्ष
स्थायी बंदोबस्त यानि कि जमींदारी प्रथा के लिए रैयतवाड़ी व्यवस्था के भी परिणाम खास नहीं रहे। इस व्यवस्था में भी किसानों का अधिक नुकसान हुआ। क्योंकि, इस व्यवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी जमींदारों को हटाकर खुद ही किसानों की जमीन का जमींदार बन गई थी। ऐसे में इस व्यवस्था से बाद में दक्कन के दंगों को बढ़ावा मिला।
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