स्कूलों में सेलफोन की अनुमति होनी चाहिए या नहीं ?

संचार का सुलभ साधन होने के कारण फैंसी आइटम की तुलना में सेल फोन की आज अत्यधिक मांग है. आज हम छोटे बच्चों को भी सेल फोन और स्मार्टफोन पर कुछ गेम खेलते हुए या चैट करते हुए देखते हैं. इससे कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि सेल फोन रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्सा बन गया हैं.अब तो सेल फोन के बिना  जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

Created On: Jun 20, 2017 14:39 IST
Modified On: Jun 21, 2017 14:39 IST

संचार का सुलभ साधन होने के कारण फैंसी आइटम की तुलना में सेल फोन की आज अत्यधिक मांग है. आज हम छोटे बच्चों को भी सेल फोन और स्मार्टफोन पर कुछ गेम खेलते हुए या चैट करते हुए देखते हैं. इससे कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि सेल फोन रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्सा बन गया हैं.अब तो सेल फोन के बिना  जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

लेकिन हाल ही में यह एक चर्चा का विषय बन गया है कि स्कूलों द्वारा सेलफोन की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं.

Debate topic Cellular phones

Image source: http://www.scarymommy.com

पक्ष : अधिकांश बच्चों और किशोरों को उनके अभिभावकों द्वारा सेल फोन दिए जाते हैं क्योंकि उनके विषय में तात्कालिक जानकारी हासिल करने का यह सबसे सस्ता और  सुविधाजनक स्रोत है. विशेषतः आपातकालीन स्थिति में माता पिता या पुलिस तथा बच्चे भी हेल्पलाइन नंबरों पर कॉल कर सहायता प्राप्त कर सकते हैं. 

अगर छात्रों को किसी चीज की आवश्यक्ता है तो वे इसके लिए अपने किसी जानकार को कॉल कर सकते हैं तथा जरुरत के अनुरूप उसे लाने के लिए भी कह सकते हैं. होमवर्क के मामले में भी यह बहुत उपयोगी साबित होता है. यदि स्कूल की बस या कोई अन्य परिवहन उपलब्ध नहीं है तो वे घर पर कॉल कर सकते हैं और अपने माता पिता से अपने आप को ले जाने के लिए कह सकते हैं.

कभी-कभी स्कूल में अचानक छात्रों को एक्स्ट्रा क्लासेज के लिए 2-3 घंटे अतिरिक्त रुकने की जरुरत पड़ती है. ऐसी स्थिति में बच्चे अपने माता पिता को सूचित कर सकते हैं ताकि वे चिंतित न हों.

आज के इस आधुनिक युग में छात्रों को न सिर्फ सेलफोन ले जाने की अनुमति दी जानी चाहिए बल्कि आज  की उपयोगी तकनीकों के सही इस्तेमाल के लिए उन्हें प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए. सेलफोन के जरिये छात्र न्यूज़ वेबसाइटों या शैक्षिक पोर्टलों को ब्राउज़ करके अपडेटेड जानकारी हासिल कर सकते हैं. एक कम कीमत वाला स्मार्टफोन सामान्यतः पर्सनल कंप्यूटर या लैपटॉप  की तरह ही काम करता है साथ ही इसकी कीमत अदा करने में आम अभिभावकों को कोई परेशानी नहीं होती इसलिए बड़ी आसानी से लोग इसे अपने बच्चे को दे देते हैं या देना पसंद करते हैं.

कक्षा सत्र के दौरान कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को याद न रख पाना एक आम बात है. अतः उस समय सभी विषयों की सामग्री को सेलफ़ोन पर रिकॉर्ड कर भविष्य में प्लेबैक कर उसे पुनः याद करने के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है.

अतः सेलफोन की अनुमति तो दी जानी चाहिए लेकिन एक निश्चित आयु या कक्षा के बाद. विशेषतः 9 वीं कक्षा के बाद ही अभिभावकों द्वारा छात्रों को सेलफोन दिया जाना चाहिए तथा स्कूलों में भी इसी दौरान छात्रों को सेलफोन रखने की अनुमति दी जानी चाहिए.

विपक्ष- स्कूलों में सेलफोन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि इससे छात्रों और शिक्षकों दोनों का पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकता है. उदाहरण के लिए अगर कक्षा में किसी सीरियस टॉपिक पर लेक्चर हो रहा हो और किसी का फोन आता है तो इससे सारी कक्षा डिस्टर्ब होती है या फिर अगर छात्र बाहर जाता है तो वह उस टॉपिक के महत्वपूर्ण विन्दुओं को मिस कर देगा. इससे छात्र का नुकसान होगा.

इस उम्र में छात्र अपरिपक्वता के कारण गैरजरुरी वेबसाइटों पर अपना समय बर्बाद करते हैं. साथ ही कुछ गलत वेबसाइटों के चयन के कारण गलत आदतों का शिकार भी हो सकते हैं. इससे उनके समग्र मानसिक और व्यक्तिगत विकास पर बुरा असर पड़ता है. 

सेल फोन का प्रयोग परीक्षा के दौरान नकल करने के लिए भी किया जा सकता है. हर साल ऐसे मामलों की कई सूचनाएं मिलती हैं. इसके अतिरिक्त स्कूलों के पास भी स्वयं के टेलीफोन होते हैं,जिनका उपयोग छात्रों द्वारा समय पड़ने पर किया जा सकता है. कभी कभी दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से फोन कैमरे का उपयोग कर अनुचित वीडियो या फोटो बनाये जा सकते हैं जो आगे चलकर छात्रों के लिए अहितकर साबित हो सकते हैं.

इसके साथ ही साथ छात्रों को स्कूल में सेलफोन देना एक अवांछित प्रतिस्पर्धा का कारण बनेगा. महंगे और आधुनिक तकनीक से लैस स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने वाले छात्रों को देखकर एक सामन्य और सस्ते फोन का प्रयोग करने वाले छात्र में कहीं न कहीं भेदभाव,हीन भावना तथा असमानता की प्रवृति का विकास होगा, जो अप्रत्यक्ष रूप से माता-पिता एवं अभिभावकों के लिए चिंता का विषय है. गौरतलब है कि समानता की प्रवृति के विकास को बढ़ावा देने के लिए ही स्कूलों में ड्रेस कोड का विधान होता है ताकि सभी विद्यार्थी समान दिखें तथा किसी के प्रति किसी भी तरह का पूर्वाग्रह न हो. 

युवा महिलाओं को लॉरियल इंडिया दे रहा है छात्रवृत्ति

ये 7 आसान तरीकों से बनाइए अपनी कार्यक्षमता बेहतर

Related Categories

    Related Stories