अनुच्छेद 356 : अरुणाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड के विशेष सन्दर्भ में

Apr 12, 2016, 14:22 IST

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 विगत कुछ महीनों से काफी चर्चा में है. जिसका मुख्य कारण केंद्र सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड में अनुच्छेद 356 के आधार पर राष्ट्रपति शासन को लागू करना है.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 विगत कुछ महीनों से काफी चर्चा में है. जिसका मुख्य कारण केंद्र सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड में अनुच्छेद 356 के आधार पर राष्ट्रपति शासन को लागू करना है.

सन्दर्भ: अरुणाचल प्रदेश
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 26 जनवरी 2016 के शाम में ‘संवैधानिक संकट’ के आधार पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत अरूणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर मुहर लगा दी और इसके साथ ही एक महीने से भी ज्यादा समय से चल रहे राजनीतिक उठापटक के बीच राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन आ गया. मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित होने के दौरान उठाए गए इस कदम की कांग्रेस और अन्य दलों ने सरकार के इस फैसले की तीखी आलोचना की और इसे लोकतंत्र की ‘हत्या’ करार दिया.

दरअसल, अरुणाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार से उसके अपने कुछ विधायक बागी हो गए हैं. दिसंबर 2015 में उन्होंने विपक्षी बीजेपी के साथ मिलकर अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें सरकार हार गई थी. इससे पहले स्पीकर ने कांग्रेस के बागी 14 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी. लेकिन डिप्टी स्पीकर ने यह अविश्वास प्रस्ताव लाने से पहले उन सभी की सदस्यता बहाल कर दी थी.
इसके बाद 14 जनवरी 2016 को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने विधानसभा के दिसंबर के उस दो दिन के सत्र को ही रद्द कर दिया था, जिस दौरान यह अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया और स्पीकर के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया. मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा. लेकिन कोर्ट ने इस सियासी लड़ाई की याचिकाएं संविधान पीठ को भेज दी हैं, जो न्यायाधीन हैं.

विदित हो कि अरुणाचल विधानसभा में कुल 60 सीटें हैं. 2014 में हुए चुनाव में 42 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं. बीजेपी को 11 और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (PPA) को पांच सीटें मिली थीं. बाद में पीपीए ने कांग्रेस में विलय कर लिया और उसके 47 विधायक हो गए. लेकिन अब लेकिन मुख्यमंत्री तुकी के पास सिर्फ 26 विधायकों का ही समर्थन है और सरकार में बने रहने के लिए कम से कम 31 विधायकों का साथ चाहिए. दो सीटों पर निर्दलीय हैं.

सन्दर्भ:उत्तराखंड
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 27 मार्च 2016 को में ‘संवैधानिक संकट’ के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर मुहर लगा दी. इसके एक दिन पूर्व उत्तराखंड के राजनीतिक संकट पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की आपात बैठक हुई थी, जिसमें राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश की गई थी. मंत्रिमंडल की बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देर रात राष्ट्रपति को यथास्थिति से अवगत कराया था.
उत्तराखंड में राजनीतिक संकट तब शुरू हुआ जब 70 सदस्यों की विधानसभा में कांग्रेस के 36 में से 9 विधायक बाग़ी हो गए. विधानसभा में भाजपा के 28 सदस्यों हैं जिनमें से एक निलंबित हैं. इसके अलावा विधानसभा में बसपा के दो, निर्दलीय विधायक तीन और उत्तराखंड क्रांति दल का एक विधायक है.

बजट सत्र के दौरान विवाद तब पैदा हुआ जब भाजपा ने आरोप लगाया कि बजट विधेयक पारित ही नहीं हुआ है क्योंकि कांग्रेस के पास बहुमत ही नहीं है. इसके बाद 28 मार्च 2016 को कांग्रेस सरकार को विश्वास मत हासिल करना था लेकिन रविवार को ही केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

अनुच्छेद 356: संविधानिक स्थिति
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356, केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति उस अवस्था में देता है, जब राज्य का संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया हो.
राष्ट्रपति शासन, भारत में शासन के संदर्भ में उस समय प्रयोग किया जाने वाला एक पारिभाषिक शब्द है, जब किसी राज्य सरकार को भंग या निलंबित कर दिया जाता है और राज्य प्रत्यक्ष संघीय शासन के अधीन आ जाता है. भारत के संविधान का अनुच्छेद-356, केंद्र की संघीय सरकार को राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता या संविधान के स्पष्ट उल्लंघन की दशा में उस राज्य सरकार को बर्खास्त कर उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार देता है. राष्ट्रपति शासन उस स्थिति में भी लागू होता है, जब राज्य विधानसभा में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं हो.
सत्तारूढ़ पार्टी या केंद्रीय (संघीय) सरकार की सलाह पर, राज्यपाल अपने विवेक पर सदन को भंग कर सकते हैं, यदि सदन में किसी पार्टी या गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत ना हो. राज्यपाल सदन को छह महीने की अवधि के लिए ‘निलंबित अवस्था' मे रख सकते हैं. छह महीने के बाद, यदि फिर कोई स्पष्ट बहुमत प्राप्त ना हो तो उस दशा में पुन: चुनाव आयोजित किये जाते हैं.
अनुच्छेद 356 के तहत लागू शासन व्यवस्था को राष्ट्रपति शासन इसलिए कहा जाता है क्योंकि, इसके द्वारा राज्य का नियंत्रण बजाय एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के, सीधे भारत के राष्ट्रपति के अधीन आ जाता है, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से राज्य के राज्यपाल को केंद्रीय सरकार द्वारा कार्यकारी अधिकार प्रदान किये जाते हैं. प्रशासन में मदद करने के लिए राज्यपाल आम तौर पर सलाहकारों की नियुक्ति करता है, जो आम तौर पर सेवानिवृत्त सिविल सेवक होते हैं. आमतौर पर इस स्थिति मे राज्य में केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की नीतियों का अनुसरण होता है.
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में जारी अपने संस्मरण में कहा कि राष्ट्रपति शासन को लागू करने पर इसका दुरूपयोग हो सकता है लेकिन पिछले कुछ सालों में प्रक्रियात्मक बदलावों ने इस संभावना को कुछ कम कर दिया है. राष्ट्रपति के इस कथन को इस संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि इस वक्तव्य के ठीक पहले उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा पर हस्ताक्षर किये. अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने का फैसला अब उच्चतम न्यायालय के विचाराधीन है जिसने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने वाली राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा की रिपोर्ट मांगी है. अदालत ने रिपोर्ट मांगते हुए पूर्वोत्तर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने को बहुत गंभीर मामला कहा है.
राष्ट्रपति ने अपने संस्मरण में कहा कि असाधारण परिस्थितियों में राज्यों के अधिकार केंद्र द्वारा लेने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 356 के माध्यम से स्पष्ट है. राष्ट्रपति ने अपनी किताब में लिखा, ‘कई बार केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा इस अधिकार के कथित दुरूपयोग की वजह से इस प्रावधान की तीखी आलोचना हुई है.’ उन्होंने कहा कि मार्च 2001 तक गणतंत्र के पहले 50 साल में विभिन्न राज्यों में 108 मौकों पर राष्ट्रपति शासन लगाये जाने संबंधी तथ्य ‘इस आरोप को कुछ बल प्रदान करते दिखाई देते हैं. अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने का दुरूपयोग हो सकता है, लेकिन सालों तक हुए प्रक्रियात्मक बदलावों ने इस संभावना को कुछ कम किया है.’
विदित हो कि पहले किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन तीन साल तक जारी रह सकता था जिसके लिए हर छह महीने में संसद की मंजूरी जरूरी होती थी. हालांकि संविधान में 44वें संशोधन के बाद अब राष्ट्रपति शासन केवल एक साल के लिए ही लगाया जा सकता है जिसके लिए घोषणा के दो महीने के अंदर संसद के दोनों सदनों की मंजूरी जरूरी होगी.
मुखर्जी ने उच्चतम न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि, ‘राष्ट्रपति अनुच्छेद 356 (1) के उपबंधों ए, बी और सी के तहत कोई अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं कर सकते, जिसका अर्थ हुआ कि जब तक राष्ट्रपति शासन की घोषणा को संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति नहीं मिल जाती, तब तक राज्य विधानसभा को भंग नहीं किया जा सकता.’ उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द टर्ब्यलेंट ईयर्स : 1980-1996’ में लिखा है कि राष्ट्रपति शासन घोषित करने के अधिकारों में नरमी के बावजूद आलोचक हमारे संघीय ढांचे में संगठित पूर्वाग्रह की बात करते हैं.
राष्ट्रपति ने कहा, ‘साक्ष्य के रूप में वे इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि राज्य की सूची के अधीन विषयों में भी राज्यपाल राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी विधेयक पर अपनी स्वीकृति रोककर रख सकते हैं और राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए इसे रखते हैं. इस पर जवाबी तर्क है कि केंद्र की पूरे देश को एक मानकर उसके हित पर विचार करने की राष्ट्रव्यापी सोच और क्षमता होती है.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 से संबंधित उपरोक्त तथ्यों एवं घटनाओं के आलोक में हम कह सकते है कि अनुच्छेद 356 भारतीय संविधान का वह महत्वपूर्ण अंग है जो भारत के संघीय स्वरूप को साकार रूप देते हुए केंद्र को राज्यों के ऊपर वरीयता प्रदान करता है. इसके साथ ही साथ यह अनुबंध भारतीय संविधान के अनुकूल शासन व्यवस्था को सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण साधन है. लेकिन जरुरत है इसके सही प्रयोग को सुनिश्चित करने की ताकि इसे राजनैतिक वैमनस्व को साधने का साधन न बनाना पड़े. क्योकिं, कहा गया है “कोई कानून या विधान कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि उसे लागू करने वाले सही नहीं हों तो वह बेकार एवं नकारात्मक साबित होता है.”

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