भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने मानसून और जलवायु परिवर्तन से जुड़े विविध आयामों के अध्ययन करने वाले प्रथम मौसम उपग्रह मेघा ट्रापिक्स को 12 अक्टूबर 2011 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफल प्रक्षेपण किया. मौसम उपग्रह मेघा ट्रापिक्स को प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी 18 से अंतरिक्ष में भेजा गया.
मौसम उपग्रह मेघा ट्रापिक्स को भारत और फ्रांस के संयुक्त प्रयास से तैयार किया गया है. मेघा ट्रापिक्स के साथ तीन अन्य नैनो उपग्रहों को भी कक्षा में स्थापित किया गया. ये तीन नैनो उपग्रह हैं: वेसलसैट-1 (लक्जमबर्ग), एसआरएमसैट (एसआरएम विश्वविद्यालय, चेन्नई) और जुगनू (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर).
मौसम उपग्रह मेघा ट्रापिक्स: मेघा- ट्रापिक्स (संस्कृत में मेघा का अर्थ बादल होता है जबकि उष्णकटिबंधीय के लिए ट्रापिक्स फ्रांसीसी भाषा का शब्द है) इसका वजन 1000 किलोग्राम है. मेघा-ट्रापिक्स में तीन पेलोड हैं. इनमें फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस (सेंटर नेशनल डि’इतुदेस स्पाशिएलेस) के दो और इसरो तथा सीएनईएस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित एक पेलोड शामिल है. इसके अलावा एक पूरक वैज्ञानिक उपकरण भी है.
विषुवत रेखा से 20 डिग्री के झुकाव के साथ और पृथ्वी से 867 किलोमीटर की दूरी पर कक्षा में स्थापित मेघा ट्रापिक्स उपग्रह से प्राप्त सूचना से न केवल भारत को लाभ होना है बल्कि हिन्द महासागर क्षेत्र के सभी देशों और दुनिया के अन्य हिस्सों को भी फायदा होना है.
यह उष्ण कटिबंधीय जलवायु के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष में भेजा गया दूसरा वैश्विक मिशन है. इससे पहले नासा और जापान ने वर्ष 1997 में इस तरह का मिशन पूरा किया था.
जुगनू (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर): तीन किलोग्राम वजनी उपग्रह जुगनू में एक कैमरा लगा है जो पेड़-पौधों, जलाशयों, झीलों और तालाबों पर नजर रखने के लिए पृथ्वी की तस्वीरें ले सकता है. इससे मिलने वाले आंकड़ों का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर में स्थापित एक ट्रैकिंग प्रणाली के माध्यम से अध्ययन किया जाएगा और हासिल की गई तस्वीरों और सूचनाओं को शोध के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. साथ ही यह बाढ़, सूखा और आपदा प्रबंधन के संबंध में सूचनाओं को इकट्ठा करने में मदद करेगा.
एसआरएमसैट (एसआरएम विश्वविद्यालय, चेन्नई): एसआरएम विश्वविद्यालय और इसरो द्वारा विकसित एसआरएमसैट का वजन 10 किलोग्राम है और यह ग्रेटिंग स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से कार्बन डाई ऑक्साइड और जल वाष्प पर नजर रखेगा.
वेसलसैट-1 (लक्जमबर्ग): लक्जमबर्ग के लक्सस्पेस ने वैसलसैट-1 को विकसित और निर्मित किया है जिसका वजन 28 .7 किग्रा है. इसमें समुद्र में यात्रा कर रहे जलयानों से स्वत: ट्रांसमिट हो रहे सिगनलों का पता लगाने के लिए रिसीवर लगे हैं.
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