जिनेवा विश्वविद्यालय के भौतिकशास्त्री जेरोम कास्पेरियन के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने आसमान में एक विशाल लेजर बीम छोड़कर हवा में पानी की बूंद बनाने की क्षमता हासिल कर ली. जल संघनन की विधि (laser-assisted water condensation technique) पर आधारित यह प्रयोग जिनेवा के करीब स्थित रोन नदी के तट पर सितंबर 2011 के प्रथम सप्ताह में किया गया.
जिनेवा के करीब स्थित रोन नदी के तट पर बारिश करवाने के लिए तेज लेजर बीम दागा गया, जिसके 133 घंटे बाद हवा में नाइट्रिक एसिड के कणों का निर्माण हुआ. ऐसा होने पर इन कणों ने जल के अणुओं को जोड़ने का काम किया जिससे बादल में बूंदों का निर्माण हुआ और बारिश हुई.
जल संघनन की विधि (laser-assisted water condensation technique) में बारिश करवाने के लिए लाल रंग की लेजर बीम के जरिए कणों से भरे बादलों के झुंड में छेद किया जाता है. इसमें स्वाभाविक रूप से आद्रता के स्तरों और वातावरण की स्थितियों को पानी की बूंदें बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
जल संघनन की विधि द्वारा सही निशाना सही जगह पर आसानी से लगाया जा सकता है. साथ ही इस विधि में भारी मात्रा में सिल्वर आयोडाइड इस्तेमाल करने की भी जरूरत नहीं है, जो कि पर्यावरण हेतु सुरक्षित है. इस विधि द्वारा बारिश पर नियंत्रण हासिल किया जा सकता है कि कब, कहां और कितनी बरसात हो.
ज्ञातव्य हो कि चीन और जापान जैसे देश क्लाउंड सीडिंग विधि से इसके पूर्व भी इच्छानुसार बारिश कराते या उसे रोकने की क्षमता हासिल कर चुके हैं. पर यह विधि उतनी कारगर नहीं मानी गई है. साथ ही इससे पर्यावरण संबंधी कई समस्याएं भी खड़ी हुई हैं. चूंकि इस विधि में बादलों में रिक्त स्थानों को सूखी बर्फ और सिल्वर आयोडाइड से भरा जाता है. इससे बादल बनने में काफी दूर तक रसायन फैल जाते हैं, जो वातावरण के लिए हानिकारक हैं.
वर्ष 1946 में विंसेंट शेफर ने क्लाउंड सीडिंग की तकनीक विकसित की थी. इसका आज भी इस्तेमाल होता है. वर्ष 2008 में चीन में हुए ओलंपिक के दौरान क्लाउड सीडिंग विधि से ही चीन ने खेलों के दौरान मानसून होने के बाद बावजूद बरसात को कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया था.
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