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हुमायूँ

अपने पिता बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं 1530 ईस्वी में सिंहासन पर बैठा.
Aug 22, 2014 15:18 IST
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अपने पिता बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं 1530 ईस्वी में सिंहासन पर बैठा. शासक बनने से पूर्व हुमायूँ बाबर की सेना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका था. यहाँ तक की वह बदख्शां प्रान्त का शासक भी रह चुका था. हुमायूँ अपने पिता बाबर की भांति ना तो अधिक ताकतवर था और ना ही चालाक. साथ ही उसके अन्दर बाबर जैसी प्रतिभा का अभाव था. उसने अपना अधिकांश समय बेवजह के कार्यों और वैवाहिक सम्बन्धो को बनाने और हास्यपूर्ण जीवन जीने में व्यतीत कर दिया. संभव है की इसी वजह से उसे चारो तरफ से अनेक आक्रमणों का सामना करना पड़ा. उसके दुश्मनो में निम्नलिखित लोग शामिल थे.

• उसके छोटे भाई कामरान ने उसके राज्य के उत्तर पश्चिम सीमांत भाग में उसके लिए खतरा उत्पन्न किया.

• अफगान भी पूर्व में एक खतरा थे.

• गुजरात का राजा बहादुर शाह और मालवा के राजा भी हुमायूँ के लिए एक खतरा थे.

• बाबर ने अपने शासन काल में राजपूतों को सिर्फ अपने मातहत बनाया था ना की उन्हें नेस्तनाबूत किया था इसलिए वे भी हुमायूं के लिए एक चुनौती प्रस्तुत किये.

हुमायूं द्वारा लड़े गए युद्ध

• हुमायूं ने कालिंजर के राजा के ऊपर आक्रमण किया और उसने अपने समक्ष प्रस्तुत होने पर मजबूर किया.

• उसने दोहरिया के निर्णायक युद्ध में महमूद लोदी को हराया.

• उसने 1532 ईस्वी में चुनार की घेराबंदी का नेतृत्व किया और शेरशाह को अपने समक्ष प्रस्तुत होने पर मजबूर कर दिया.

• हुमायूँ ने गुजरात के शासक बहादुर शाह को और मालवा के शासक को पराजित किया. साथ ही इन दोनों के समस्त क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया.

चौसा की लड़ाई

चौसा की लड़ाई चौसा की लड़ाई 1539 ईस्वी में हुमायूं के नेतृत्व में मुगल सेना और शेरशाह के नेतृत्व में अफगान सेना के मध्य लड़ा गया था. इस युद्ध में अफगान सेना के समक्ष मुग़ल सेना पूरी तरह से पराजित हो गयी थी. एक तरह से हुमायु भारत से निष्काषित कर दिया गया.

कन्नौज की लड़ाई

कन्नौज के युद्ध में मुग़ल और अफगान सेना एक बार फिर से 1540 ईस्वी में एक दुसरे के सामने आ गयी. इस युद्ध में हुमायूँ की सेना निर्णायक तौर पर अफगान सेना से पराजित हो गयी. हुमायूँ ने भारत छोड़ दिया और निष्कासन भरे जीवन जीता रहा. इस तरह से वह अगले 15 वर्षो तक निष्कासन पूर्ण जीवन जीता रहा.
उसने ईरान(पर्सिया) के शाह तःमास्प ए ऐदाब के दरबार में शरण लिया. वह अपने भाई असकरी से कंधार को जीतने में पूरी तरह से सक्षम था. उसने कामरान से 1547 ईस्वी में काबुल को विजित कर लिया.

हुमायूं की सत्ता में वापसी और उसकी मृत्यु

1545 ईस्वी में शेरशाह की मृत्यु हुमायूं के लिए वरदान शाबित हुई. शेरशाह के उत्तराधिकारी इतने मजबूत और सक्षम नहीं थे कि शेरशाह के द्वारा बनाये गए शासन को संभल सकें. हुमायूँ 1555 ईस्वी में काबुल से दिल्ली की तरफ अभियान किया और अफगान शासक सिकंदर सूरी को पंजाब में पराजित किया. उसके बाद वह दिल्ली और आगरा की तरफ अपना रुख किया और आसानी से दोनों को हस्तगत कर लिया. यद्यपि वह सिर्फ 6 महीनों तक शासन कर सका और अपने महल की सीढियों से फिसल कर गिर पड़ा जिसकी वजह से उसकी मृत्यु हो गयी.

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