अवध के अंतिम नवाब कौन थे, जिन्हें कहा जाता था ‘अख्तर पिया’

Last Updated: Jun 26, 2026, 12:45 IST

अवध के अंतिम नवाब ने 1847 से 1856 तक शासन किया था। उन्हें संगीत और कला से अधिक लगाव था। यही वजह है कि उनके शासनकाल में लखनऊ में कला, संगीत, पाककला और कथक अधिक समृद्ध हुए। उन्होंने अपना अंतिम समय कलकत्ता में बिताया। 

अवध के अंतिम नवाब
अवध के अंतिम नवाब

उत्तर प्रदेश का लखनऊ शहर अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जाता है। यह कभी अवध का प्रमुख हिस्सा हुआ करता था। यहां अवध के विभिन्न नवाबों ने शासन किया। इस कड़ी में यहां अवध के अंतिम नवाब भी हुए, जिन्होंने अवध की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया।

उन्होंने संगीत, कथक, कविताएं और पाककला को जीवंत रखते हुए इन्हें नया आयाम दिया। आज भी लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत में अवध के अंतिम नवाब का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। 

कौन थे अवध के अंतिम नवाब 

अवध के अंतिम और 11वें नवाब मिर्जा वाजिद अली शाह थे। उनका जन्म 30 जुलाई, 1822 को एक शाही परिवार में नवाब अमजद अली शाह के पुत्र के रूप में हुआ था। मिर्जा वाजिद अली ने 13 फरवरी, 1847 को अवध की गद्दी संभाली थी और 9 सालों तक शासन किया था। उन्होंने सत्ता संभालने के बाद न्याय व्यवस्था की निगरानी करने के साथ सुधारों को लागू किया और इंटरनल एडमिनिस्ट्रेशन को मजबूत करने के लिए सेना का पुनर्गठन किया।

1856 में हुआ लखनऊ का विलय

लखनऊ में ब्रिटिश रेजेडेंट जनरल विलियम स्लीमैन ने अवध में कुप्रशासन और कानूनहीनता का आरोप लगाते हुए एक रिपोर्ट तैयार की, जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर-जनरल डलहौजी ने अपनी नीतियों के तहत अवध विलय का आधार बनाया। इस कड़ी में 1856 में 11 फरवरी को वाजिद अली शाह के 9वें राज्याभिषेक से पहले कंपनी ने अवध को अपने राज्य में मिला लिया। 

कलकत्ता में बिताए अपने आखिरी दिन

अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह को उनके पद से हटा दिया और उन्हें स्टीमर की मदद से कानपुर होते हुए कलकत्ता के मेटियाबुरुज इलाके में भेज दिया गया। नवाब ने यहां से इंग्लैंड जाने का प्रयास किया, जिससे वह ब्रिटेन की महारानी से मिलकर अपनी परेशानी बता सके, लेकिन अंग्रेजी सेना ने उन्हें नहीं जाने दिया। 

वाजिद अली शाह की प्रमुख रचनाएं 

वाजिद अली शाह ने अपने शासनकाल में कई प्रमुख रचनाएं की, जो कि इस प्रकार हैंः

-उन्होंने ‘अख्तर’ और ‘कैसर’ नाम की ऊर्दू और फारसी में कविताओं की रचनाएं कीं।

-उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में से एक ‘सवातूल कलूब’ है, जिसमें 44,562 दोहे लिखे गए हैं।

-उन्होंने ‘अख्तरपिया’ नाम से गजल और ठुमरी की रचनाएं की थीं। इस वजह से उन्होंने अख्तरपिया नाम अपना लिया था।

-उनके शासनकाल में ही कथक के लखनऊ घराने का उदय हुआ था, जो कि भाव-भंगिमाओं, चाल और ठुमकों के लिए जाना जाता है।

-उन्होंने 1848 से 1850 तक लखनऊ के कैसर बाग का निर्माण करवाया, जो कि अपनी वास्तकुला के लिए जाने जाता है।

-उन्होंने कलकत्ता बिरयानी में केसर आलू का परिचय कराया था। साथ ही, उन्होंने दम-पुख्त खाना बनाना की शैली को भी बढ़ावा दिया।

-वाजिद अली शाह ने 1 नवंबर, 1887 को कलकत्ता में अपनी अंतिम सांस ली।  

Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Jun 26, 2026, 12:45 IST

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