केंद्र सरकार द्वारा सहमति दिए जाने के उपरांत भारत 16 जनवरी 2017 को यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन (सर्न) का सहयोगी सदस्य राज्य बना.
इससे पहले नवम्बर 2016 को भारत ने इस संगठन के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते पर परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष शेखर बासु एवं सर्न के महानिदेशक फैबिओला जियानोती द्वारा हस्ताक्षर किये गये.
सहयोगी सदस्य होने के नाते भारत को सर्न के डाटा पर पूरा अधिकार होगा. अब अतिरिक्त शुल्क देने पर भारत सर्न द्वारा किये जाने वाले सभी अनुसंधानों में भाग ले सकेगा. भारतीय उद्योगपति सर्न की निविदाओं में भी भाग ले सकेंगे.
सहयोगी सदस्य के रूप में भारत को प्रत्येक वर्ष सर्न को 40 करोड़ रुपये देने होंगे.
भारत-सर्न संबंध
• भारत और सर्न के संबंध 1991 में उस समय आरंभ हुए जब दोनों ओर से सहयोग समझौता किया गया. इस दौरान विभिन्न प्रोटोकॉल पर भी समझौता किया गया.
• भारत के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च ने 1960 से ही सर्न के साथ काम करना शुरू कर दिया था. संस्थान के भौतिकवादी सर्न में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे.
• इनके बाद राजा रमन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों द्वारा 1990 में सर्न में भागीदारी आरंभ की गयी.
• यह संस्थान एलईपी एक्सीलेटर एवं एल3, डब्ल्यूए93 तथा डब्ल्यूए89 डिटेकटर्स का निर्माण भी करता है.
• भारत के वैज्ञानिकों के इस कार्य के चलते उन्हें लार्ज हैड्रन कोलाईडर के निर्माण में सहयोगी भूमिका निभाने का अवसर प्राप्त हुआ.
• भारत द्वारा दिए गये योगदान के चलते वर्ष 2002 में भारत को सर्न काउंसिल का आब्जर्वर बनाया गया.
• भारतीय वैज्ञानिक आईएसओएलडीई में भी भागीदार रहे. यह एक उच्च तकनीकी पार्टिकल डिटेक्टर है.
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