इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनाव को निश्चित समयावधि के तहत कराने का निर्देश दिया. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 19 अक्टूबर 2011 को दिए अपने निर्देश में राज्य निर्वाचन आयोग को 31 अक्टूबर तक चुनाव की अधिसूचना जारी करने का निर्देश भी दिया ताकि 15 नवंबर 2011 तक चुनाव कराया जा सके.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अमिताव लाला व न्यायमूर्ति वीके माथुर की खंडपीठ ने अपने निर्देश में उत्तर प्रदेश निर्वाचन आयुक्त से वर्ष 2011 की जनगणना का वार्ड-वार ब्योरा और जातिगत जनगणना का ब्योरा राज्य सरकार को उपलब्ध कराने को कहा है ताकि वार्डों का परिसीमन तथा सीटों के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी की जा सके.
ज्ञातव्य हो कि अजीत जायसवाल व नीरज कुमार मिश्रा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी और न्यायालय को यह बताया था कि उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनाव वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर करा रही है. याचिका पर निर्देश देते हुए न्यायालय ने बताया कि वर्ष 2011 की जनगणना प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर चुनाव कराने का कोई औचित्य नहीं है.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया कि स्थानीय निकाय चुनाव 5 वर्ष की कार्यावधि समाप्त होने पर कराया जाना संवैधानिक बाध्यता है. चुनाव आपत्तियों के निस्तारण व अन्य तकनीकी कारणों से किसी भी दशा में टाला नहीं जा सकता है. न्यायालय ने बताया कि वैधानिक दायित्व है कि राज्य सरकार चुनाव नियत समय से कराए तथा चुनाव उपलब्ध जनगणना के आधार पर कराया जाए.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्देश में यह भी बताया कि अनुच्छेद 243 यू के उपबंध बाध्यकारी हैं तथा अनुच्छेद 226 के तहत चुनाव पर रोक लगाने का अधिकार उच्च न्यायालय को भी नहीं है. साथ ही मतदाता सूची तैयार करना एक सतत प्रक्रिया है चाहे चुनाव होने वाला हो अथवा न हो. अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग को अनुपातिक प्रतिनिधित्व का अधिकार प्राप्त है. इसलिए जातिवाद डाटा उपलब्ध न होने पर भी चुनाव कराने में देरी नहीं की जा सकती है.
ज्ञातव्य हो कि उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय का पिछला चुनाव 2 नवंबर 2006 को हुआ था.
Comments
All Comments (0)
Join the conversation