भारत के पश्चिमी तट पर दो नए शैवाल प्रजातियों की खोज की गई है.इन शैवालों का नाम उल्वा पश्चिमा बास्त और क्लादोफोरा गोअनोसिस बास्त है.
इन प्रजातियों की सबसे बड़ी खासियत इन शैवालों की वातावरण से कार्बन डाइ ऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता है जिससे स्वाभिक रूप से ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिलेगी.
इन प्रजातियों की खोज डॉ फेलिक्स बास्ट और पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय,भटिंडा के दो शोध छात्रों सतेज भूषण और एजाज अहमद जॉन ने की. खोज की पुष्टि पीएलओएस वन पत्रिका और भारतीय समुद्री भारतीय विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित लेख में की गई.
खोज का महत्व
• इन शैवालों की वृधि दर भी तेज है और इन शैवालों की कार्बन को सोखने की क्षमता भी अच्छी है.
• शैवाल की इन दो प्रजातियों को जैव ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
• इसकी बढ़त या खेती से क्षेत्र की स्थानीय वनस्पतियों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा और ना ही ये उस क्षेत्र के जैविक वातावरण को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगे.शैवाल की यह प्रजातियाँ भारत के पश्चिमी तट की स्थानिक प्रजातियाँ हैं.
• इन प्रजातियों की खेती के लिए किसी तरह के उर्वरक या कीटनाशक या किसी भी महंगी खेती प्रणाली जैसे फोटो बायो रिएक्टर के उपयोग की आवश्यकता नहीं होगी.ये शैवाल तटरेखा के साथ सहज विकास करने में सक्षम हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड को पृथक भी कर सकते हैं.
• ये प्रजातियाँ औषधि निर्माण में भी सहायक होंगी.इससे पूर्व भी कई शैवालों का प्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में हुआ है, जैसे खालालिदे एफ, जिसका प्रयोग स्तन कैंसर और पौरुष ग्रंथि सबंधी बीमारियों में किया जाता है.
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