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Ram mandir Murti: अयोध्या राम मंदिर में श्रीराम की 5 वर्षीय बालस्वरूप ही मूर्ति क्यों, जानें

Last Updated: Jan 22, 2024, 13:39 IST

Ram mandir Murti: जिस दिन का पूरे भारत को वर्षों से इंतजार था, वह दिन आ गया है। 22 जनवरी को पूरे विधि विधान के साथ अयोध्या राम मंदिर के गर्भगृह में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो गई है। ऐसे में पूरा भारतवर्ष राममय हो गया है और हर तरफ हर्ष और उल्लास का माहौल है। गर्भगृह में रामलला की बालस्वरूप मूर्ति को स्थापित किया गया है। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि आखिर पांच वर्ष के रामलला को ही मंदिर में क्यों स्थापित किया गया है। यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे। 

राम मूर्ति अयोध्या
राम मूर्ति अयोध्या

Ram mandir Murti: सबके राम और सबमें राम, इन शब्दों के साथ 22 जनवरी, 2024 की तारीख स्वर्णिम अक्षरों के साथ इतिहास के पन्नों में हमेशा-हमेशा के लिए एक नए अध्याय के साथ जुड़ गई है। क्योंकि, भारतवर्ष के लोगों को इस दिन का वर्षों से इंतजार था, जो कि अब पूरा हो गया है।

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में भगवान रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो गई है, जिसके बाद देश के हर प्रदेश, जिले, शहर और कस्बे अयोध्या से जगमगा रहे हैं। मंदिर के गर्भगृह में श्रीराम की पांच वर्षीय बालस्वरूप मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई है। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि आखिर क्या वजह है जिस कारण मंदिर में पांच वर्षीय मूर्ति को ही स्थापित किया गया है। यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे। 

 

मूर्ति से जुड़ी कुछ खास बातें

सबसे पहले हम मंदिर से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में जान लेते हैं। गर्भगृह में जिस मूर्ति की स्थापना की गई है, उस मूर्ति की ऊंचाई 51 इंच की है। भगवान श्रीराम बालस्वरूप में कमल के आसन पर खड़े हुए हैं, जिनके बाएं ओर हनुमान, मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, ऊं, शेषनाग और सूर्य हैं, जबकि श्रीराम के दाएं ओर गदा, स्वास्तिक, हाथ में धनुष, परशुराम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि और गरूड़ है। मूर्ति को मुख्यरूप से मैसूर के अरूण योगीराज द्वारा बनाया गया है।  

बालस्वरूप मूर्ति की ही स्थापना क्यों

अब सवाल है कि आखिर मंदिर के गर्भगृह में पांच वर्ष की मूर्ति की ही स्थापना क्यों की गई है, तो आपको बता दें कि हिंदू धर्म में बाल्याकल पांच वर्ष की आयु तक माना जाता है। वहीं, पांच वर्ष की आयु के बाद बोधगम्य शुरू हो जाता है। इसके साथ ही मान्यताओं के मुताबिक, जन्मभूमि में बालस्वरूप में ही उपासना की जाती है।

चाणक्य समेत अन्य विद्वानों ने भी पांच वर्ष की आयु को वह आयु माना है, जब किसी बच्चे को गलती का अहसास नहीं होता है और इसके बाद उसे बोध होना शुरू हो जाता है। चाणक्य नीति में इन दोनों चरणों का कुछ इस तरह से वर्णन किया गया हैः 

पांच वर्ष लौं लालिये, दस सौं ताड़न देइ। सुतहीं सोलह बरस में, मित्र सरसि गनि लेइ।।

वहीं, काकभुशुंडी ने भी श्रीराम के बाल स्वरूप को लेकर वर्णन किया है, जिसमें कहा गया है कि 

तब तब अवधपुरी मैं जाऊं। बालचरित बिलोकि हरषाऊं॥

जन्म महोत्सव देखउं जाई। बरष पांच तहं रहउं लोभाई॥

इसके अर्थ की बात करें, तब-तब मैं अवधपुरी जाता हूं, तो उनकी बाल लीलाओं को देखकर खुश हो जाता हूं। वहां जाकर मैं जन्म महोत्सव देखता हूं और उनकी लीला के लोभ में पांच वर्ष तक वही रहता हूं। 

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Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Jan 22, 2024, 13:37 IST

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