क्यों और कब हुई थी ‘अंजनगांव की संधि’, जानें यहां
भारतीय इतिहास में हमें अलग-अलग संधि देखने को मिलती है। इनमें से एक अंजनगांव की संधि है। यह संधि अंग्रेजों और मराठाओं के बीच हुई थी। क्या आप इस संधि के बारे में जानते हैं, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
भारत का गौरवशाली और समृद्ध इतिहास रहा है। अतीत के पन्नों पर गौर करें, तो हमें विभिन्न महत्त्वपूर्ण संधियां देखने को मिलती हैं। इनमें से एक अंजनगांव की संधि है, जो कि अंग्रेज और मराठाओं के बीच हुई थी। यह संधि भारतीय इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण संधियों में गिनी जाती है। ऐसे में क्या आपने कभी इस संधि के बारे में पढ़ा या सुना है, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
क्या थी अंजनगांव की संधि
अंजनगांव की संधि 30 दिसंबर, 1803 में हुई थी, जो कि अंग्रेजों और मराठाओं के बीच हुई थी। दरअसल, यह संधि द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का परिणाम रही थी।
किसके बीच हुई थी अंजनगांव की संधि
अंजनगांव की संधि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लॉर्ड वेलेजली के भाई रहे ऑर्थर वेलेजली और मराठा सरदार दौलतराव सिंधियां के बीच हुई थी।
क्यों हुई थी संधि
दरअसल, 1803 में मराठा और अंग्रेजों के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था। ऐसे में अंग्रेजों ने असाई और अगांव की लड़ाई में सिंधियां और भोंसले की संयुक्त सेनाओं को बुरी तरह से हरा दिया था। इस हार के बाद सिंधिया को संधी करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
क्या थी संधि की मुख्य बातें
संधि के दौरान मराठाओं को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। इसमें क्षेत्रों के त्याग से लेकर बंदरगाह पर नियंत्रण और विदेशी संबंधों पर मराठाओं की पकड़ नहीं रही थी, जो कि इस प्रकार हैः
क्षेत्रों का करना पड़ा त्याग
अंजनगांव की संधि में गंगा-यमुना दोआब का पूरा क्षेत्र अंग्रेजों के पास चला गया था। इसमें दिल्ली, आगरा और गुड़गांव जैसे क्षेत्र अंग्रेजों के हाथ में चले गए थे।
बंदरगाहों पर नहीं रहा नियंत्रण
अंजनगांव की संधि के बाद गुजरात के भरूच और अहमदनगर किले पर भी अंग्रेजों का कब्जा हो गया था।
मुगल सम्राट का प्राप्त हुआ संरक्षण
इस संधि के बाद मुगल सम्राट यानि कि शाह आलम द्वितीय मराठा के संरक्षण में से निकलकर अंग्रेजों के संरक्षण में पहुंच गए थे।
विदेशी संबंधों पर खत्म हुआ नियंत्रण
अंजनगांव की संधि के बाद सिंधिया को यह बात स्वीकार करनी पड़ी थी कि अब मराठाओं को अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी भी विदेशी संबंध नहीं बनाएंगे।
क्या पड़ा संधि का प्रभाव
इस संधि के बाद मराठा परिसंघ की कमर टुट गई थी। इससे सिंधिया की सैन्य शक्ति और राजनीतिक प्रभाव कम हो गया था। इस संधि के बाद दिल्ली और उत्तर भारत पर अंग्रेजों का सीधा नियंत्रण हो गया था। वहीं, इस संधि के बाद राजपूत राजा, जो कि पहले मराठाओं को टैक्स देते थे, वे संधि के बाद अंग्रेजों को टैक्स दिया करते थे।
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