यूनेस्को ने सर्वशिक्षा वैश्विक निगरानी रिपोर्ट 2013-14 जारी की

Jan 30, 2014, 11:34 IST

यूनेस्को ने 11वीं सर्वशिक्षा वैश्विक निगरानी रिपोर्ट 28  जनवरी 2014 को जारी की.

यूनेस्को ने 11वीं सर्वशिक्षा वैश्विक निगरानी रिपोर्ट-2013-14 (11th Education for All Global Monitoring Report 2013 – 14) 28  जनवरी 2014 को जारी की. इस रिपोर्ट का विषय रखा गया- शिक्षण और ज्ञानार्जन : सबके लिए गुणवत्ता की प्राप्ति.

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सर्वशिक्षा वैश्विक निगरानी रिपोर्ट-2013-14 में चेतावनी दी गई है कि शिक्षा में किए गए विकास के बावजूद वर्ष 2000 में डाकार, सेनेगल में तय किए गए लक्ष्यों में से एक भी वैश्विक रूप से 2015 तक हासिल नहीं हो पाएगा.
    
सर्वशिक्षा वैश्विक निगरानी रिपोर्ट 2013-14 इस तथ्य को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है कि हाशिये पर डाल दिए गए ज्यादातर वर्गों को दशकों से शिक्षा के अवसरों से वंचित रखा जा रहा है. रिपोर्ट में नई चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपूर्ण कार्य पूरे करने हेतु एक मजबूत वैश्विक 2015-उत्तरवर्ती शिक्षा ढाँचा प्रस्तुत किए जाने की वकालत की गई है.
   
रिपोर्ट के अनुसार उत्तरवर्ती-2015 (post-2015) शिक्षा-लक्ष्य तभी हासिल किए जा सकेंगे, जब उनके साथ स्पष्ट और मापनीय लक्ष्य तय किए जाएँगे और उन लक्ष्यों के साथ यह जाँचने के संकेतक होंगे कि कोई लक्ष्य पीछे नहीं छूट रहा, और साथ ही जब सरकारों तथा सहायता देने वालों के लिए विशिष्ट शिक्षा-वित्तपोषण के लक्ष्य निर्धारित किए जाएँगे.
   
सर्वशिक्षा वैश्विक निगरानी रिपोर्ट 2013-14 के मुख्य तथ्य
लक्ष्य 1
प्राथमिक-पूर्व शिक्षा : सुधारों के बावजूद बहुत सारे बच्चे प्रारंभिक बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते. वर्ष 2012 में 5 वर्ष से कम आयु के 25% बच्चों का विकास अवरुद्ध हो गया था. वर्ष 2011 में लगभग आधे युवा बच्चे प्राथमिक-पूर्व शिक्षा प्राप्त कर पाए थे, और उप-सहारा अफ्रीकी देशों में तो यह अंश केवल 18% था.
     
लक्ष्य 2
सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा : सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा एक व्यापक मार्जिन से चूके जाने की संभावना है. स्कूल से बाहर रहे बच्चों की संख्या 2011 में 57 मिलियन थी, जिनमें से आधे संघर्ष-प्रभावित देशों में रह रहे थे. उप-सहारा अफ्रीका में ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 23% गरीब लड़कियाँ ही दशक के अंत तक प्राथमिक शिक्षा पूरी कर रही थीं. यदि इस क्षेत्र में यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो 2021 में सबसे अमीर बच्चे सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर लेंगे, किंतु सबसे गरीब लड़कियाँ 2086 तक ऐसा नहीं कर पाएँगी.
     
लक्ष्य 3  
निम्नतर माध्यमिक शिक्षा : अनेक किशोरों में निम्नतर माध्यमिक शिक्षा के जरिये प्राप्त होने वाले बुनियादी कौशलों का अभाव है. 2004 से संख्या में कुछ सुधार के साथ 2011 में 69 मिलियन किशोर स्कूलों से बाहर थे. अल्प आय वाले देशों में केवल 37% किशोरों ने निम्नतर माध्यमिक शिक्षा पूरी की और सबसे गरीब किशोरों में यह दर 14% जितनी कम है. हाल की प्रवृत्ति के अनुसार, उप-सहारा अफ्रीका के परिवारों द्वारा 2111 तक ही निम्नतर माध्यमिक शिक्षा पूरी कर पाने की आशा है.
     
लक्ष्य 4
वयस्क साक्षरता : वयस्क साक्षरता में शायद ही कोई सुधार हुआ हो. 2000 से केवल 1% की गिरावट के साथ 2011 में 774 मिलियन अशिक्षित वयस्क थे. 2015 में यह संख्या थोड़ी ही घटकर 743 मिलियन होने का अनुमान है. अशिक्षित वयस्कों में से लगभग दो-तिहाई महिलाएँ हैं. विकासशील देशों में सबसे गरीब युवतियों के 2072 तक सार्वभौमिक साक्षरता प्राप्त करने की संभावना नहीं है.
   
लक्ष्य 5
प्राथमिक शिक्षा लैंगिक असमानता : लैंगिक असमानता अनेक देशों में विद्यमान है. लैंगिक समानता हालाँकि 2005 तक हासिल कर ली जानी थी, किंतु 2011 में केवल 60% देशों ने ही प्राथमिक स्तर पर और 38% देशों ने माध्यमिक स्तर पर यह लक्ष्य हासिल किया गया.
     
लक्ष्य 6
निम्नतर माध्यमिक शिक्षा लैंगिक समानता : शिक्षा की ख़राब गुणवत्ता का मतलब है कि लाखों बच्चे आधारभूत बातें नहीं सीख रहे हैं. लगभग 250 लाख बच्चे आधारभूत कौशल नहीं सीख रहे, हालाँकि उनमें से आधों ने कम से कम चार साल स्कूल में बिताए हैं. इस असफलता की वार्षिक लागत लगभग 129 बिलियन डॉलर है. निम्नतर माध्यमिक शिक्षा में लैंगिक समानता में सुधार की कुंजी शिक्षकों में निवेश करना है. लगभग एक-तिहाई देशों में 75% से कम प्राथमिक स्कूल शिक्षक राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार प्रशिक्षित हैं. एक-तिहाई देशों में वर्तमान शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की चुनौती, नए शिक्षकों को भर्ती और प्रशिक्षित करने की एक बड़ी समस्या है.

वैश्विक निगरानी रिपोर्ट और भारत
रिपोर्ट के अनुसार भारत में दो मुद्दे हैं, पहुँच और गुणवत्ता. भारत ने शिक्षा के अधिकार (अधिनियम) के तहत जहाँ पहुँच वाले भाग की लगभग पूर्ति कर दी है,वहीं अब सरकार का अगला लक्ष्य अब गुणवत्ता सुधारने पर केंद्रित करना है.
   
भारत के संदर्भ में रिपोर्ट की मुख्य तथ्य  
• भारत में शिक्षा पर कुल सरकारी व्यय का 10.5% खर्च होता है, जो सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) का 3.3% है.  
• शिक्षा पर व्यय 6% के लक्ष्य से कम था. वस्तुत: शिक्षा पर खर्च में 1999-2011 की अवधि के दौरान गिरावट आई है. गिरावट बजट-निर्धारित व्यय के प्रतिशत और जीएनपी के प्रतिशत, व्यय दोनों दृष्टियों से देखी गई. 1999 में शिक्षा पर खर्च कुल बजट-निर्धारित व्यय का 13% और जीएनपी का 4.4% था.
• भारत में अशिक्षित वयस्कों की सबसे बड़ी जनसंख्या, 287 मिलियन, है जो विश्वभर में ऐसे लोगों की कुल जनसंख्या का 37% है.
• भारत में गरीबतर परिवारों के 90% बच्चे, स्कूल में चार वर्ष पूरे कर लेने के बावजूद, अशिक्षित रहते हैं.
• संयुक्त राष्ट्र के निकाय यूनेस्को ने भारत सहित देशों को शिक्षा-क्षेत्र को अधिक निधियाँ उपलब्ध कराने के लिए अपनी कर-व्यवस्था सुधारने को कहा है.
• भारत में धनी महिलाएँ पहले ही सार्वभौमिक साक्षरता हासिल कर चुकी हैं, किंतु निर्धनतम महिलाएँ 2080 के आसपास तक ही ऐसा कर पाएँगी.
• भारत में शिक्षा पर व्यय अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है. केरल में शिक्षा पर व्यय प्रति छात्र 685 डॉलर प्रति वर्ष और हिमाचल प्रदेश में 542 डॉलर प्रति वर्ष था, जबकि पश्चिम बंगाल में यह 127 डॉलर और बिहार में 100 प्रति वर्ष था.

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 विश्लेषण
यह 11वीं ईएफए वैश्विक निगरानी रिपोर्ट 2000 में स्वीकृत वैश्विक लक्ष्यों की दिशा में देशों द्वारा की जा रही प्रगति पर एक सामयिक जानकारी उपलब्ध कराती है. यह 2015 के बाद शिक्षा को वैश्विक विकास एजेंडे के केंद्र में रखे जाने का एक सशक्त मामला भी बनाती है. वर्ष 2008 में ईएफए वैश्विक निगरानी रिपोर्ट में पूछा गया था – 'क्या हम इसे करेंगे?' अब जबकि 2015 से पहले दो ही वर्ष बचे हैं, यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि हम नहीं करेंगे.
 
इस आलोक में रिपोर्ट सरकारों से असुविधाओं का सामना कर रहे समस्त लोगों को ज्ञानार्जन उपलब्ध कराने के अपने प्रयास दोगुने करने की माँग करती है – असुविधाएँ चाहे गरीबी के कारण हों या लिंग, रहने के स्थान या अन्य कारकों के कारण. इसके अतिरिक्त, सरकारों को 2015 तक सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए 1.6 मिलियन अतिरिक्त शिक्षकों की भर्ती करने के लिए भी प्रयास अवश्य बढ़ाने चाहिए. परिणामत: रिपोर्ट में अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा के साथ समस्त बच्चों तक पहुँचने के लिए श्रेष्ठतम शिक्षक उपलब्ध कराने हेतु चार रणनीतियाँ चिह्नित की गई हैं.  
• शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों की विविधता प्रतिबिंबित करने के लिए सही शिक्षक चुने जाने अनिवार्य हैं.
• शिक्षकों को प्रारंभिक कक्षाओं से शुरू करके, सबसे कमजोर विद्यार्थियों को सहायता प्रदान के लिए अनिवार्यत: प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
• देश के सबसे चुनौतीपूर्ण भागों में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक विनियोजित कर विद्याध्ययन में असमानता पर काबू पाएँ.
• सरकारों को शिक्षकों को इस पेशे में बने रहने के लिए प्रेरित करने हेतु उचित प्रकार के प्रोत्साहन अवश्य उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, चाहे उनकी परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हों.

किंतु शिक्षक अकेले यह जिम्मेदारी नहीं उठा सकते. रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि शिक्षक शिक्षण और विद्यार्जन सुधारने के लिए भली-भांति तैयार किए गए पाठ्यक्रमों और मूल्यांकन की रणनीतियों के साथ उचित परिप्रेक्ष्य में ही चमक सकते हैं.

इन नीतिगत परिवर्तनों की एक लागत है. यही कारण है कि हमें वित्तपोषण में बदलाव करने की आवश्यकता है. आधारभूत शिक्षा इस समय 26 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष की कम निधियाँ पा रही है, जबकि सहायता में गिरावट जारी है. इस स्थिति में सरकारें शिक्षा में निवेश घटाना मंजूर नहीं कर सकतीं – न ही दानकर्ताओं को अपने निधिकरण के वायदों से पीछे हटना चाहिए. यह रिपोर्ट अत्यावश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए पैसे जुटाने के नए रास्ते तलाशने की माँग करती है.

वैश्विक निगरानी रिपोर्ट के बारे में
सर्वशिक्षा वैश्विक निगरानी रिपोर्ट सेनेगल की राजधानी डाकार में वर्ष 2000 में स्थापित की गई थी. रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य 2015 तक सर्वशिक्षा लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रतिबद्धता सूचित करना, प्रभावित करना और कायम रखना है.

अप्रैल 2000 में आयोजित यूनेस्को सम्मलेन में 164 देशों के 1100 सहभागियों ने डाकार कार्रवाई रूपरेखा, 'सर्वशिक्षा : अपनी सामूहिक प्रतिबद्धताओं की पूर्ति' को अपनाया था. इन सहभागियों ने व्यापक दायरे वाले छह शिक्षा-लक्ष्य 2015 तक पूरे करने पर सहमति जताई थी.

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