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भारत में पायी जाने वाली मृदाएं

Last Updated: Nov 23, 2016, 19:12 IST

मृदा शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द सोलम (Solum) से हुई है | जिसका अर्थ है फर्श (floor) | मृदा, पृथ्वी को एक पतले आवरण के रूप में ढके रहती है | भारत में सबसे अधिक (43.4%) भूभाग पर जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है और अन्य मिट्टियों में काली मिट्टी, लाल मिट्टी और लैटराइट मिट्टी पायी जाती है |

भारत में पायी जाने वाली मृदाएं
भारत में पायी जाने वाली मृदाएं

मृदा शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द सोलम (Solum) से हुई है | जिसका अर्थ है फर्श (floor) | मृदा,  पृथ्वी को एक पतले आवरण में ढके रहती है तथा जल और वायु की उपयुक्त मात्रा के साथ मिलकर पौधों को जीवन प्रदान करती है | भारत में सबसे अधिक (43.4%) भूभाग पर जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है और अन्य मिट्टियों में काली मिट्टी, लाल मिट्टी और लैटराइट मिट्टी पायी जाती है |

मृदा के सम्बन्ध में दो महत्वपूर्ण धारणाएं है :

1. पेडालोजी (Pedology): इसके अंतर्गत मृदा की उत्पत्ति और वर्गीकरण तथा मृदा का विस्तृत अध्ययन किया जाता है | मृदा का शीघ्र प्रायोगिक उपयोग करना इसका प्रमुख विषय नही है | एक pedalogist मृदा के प्राकृतिक वातावरण में ही उसका अध्ययन, जाँच तथा वर्गीकरण करता है |

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2. एडेफोलोजी (Edaphology): इसके अनुसार मृदा, पेड़ पौधों के लिए एक प्राकृतिक आवास है| पौधों के उत्पादन सम्बन्धी मृदा के गुणों का अध्ययन ही एडेफोलोजी कहलाता है | इस का मुख्य लक्ष्य आहार एवं फाइबर का उत्पादन करना होता है |

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भारत में पायी जाने वाली प्रमुख मृदाएँ इस प्रकार हैं :

1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil): इस मिट्टी का विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किमी. है| भारत में सबसे अधिक (43.4%) भूभाग पर जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है | यह उत्तर भारत के मैदानों तथा दक्षिण भारत के तटीय मैदानों की मिट्टी है जो मुख्यतः नदियों द्वारा वाहित होती है | इस मृदा में पोटाश व चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तथा फास्फोरस, नाइट्रोजन एवं जीवांश की कमी होती है | यह मिट्टी गन्ना, गेहूं, धान, तिलहन, दलहन आदि की खेती के लिए बहुत ही उपजाऊ होती है |

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2. लाल मिट्टी (Red Soil):  इस मिट्टी का विस्तार मुख्य तौर से तमिलनाडु, कर्नाटक, दक्षिण पूर्वी महाराष्ट्र, ओडिशा, पूर्वी मध्य प्रदेश, बुन्देलखंड के कुछ भागों में तथा छोटा नागपुर में है | इस मृदा का विस्तार देश के 18.6% भूभाग पर है | इस प्रकार यह देश में पायी जाने वाली दूसरी सबसे अधिक विस्तृत क्षेत्र वाली मृदा है | इसका निर्माण ग्रेनाइट, नीस और सिस्ट जैसे खनिजों से होता है | इसमें लोहे का अंश सबसे अधिक होता है | इसमें पैदा की जाने वाली फसलें तम्बाकू, बाजरा, तिलहन और गेहूं हैं |

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3. काली मिट्टी (Black Soil) : इस मिट्टी का विस्तार मुख्यतः गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, और तमिलनाडु के लावा क्षेत्रों में पाया जाता है | यह भारत के 15% भूभाग में पायी जाती है | उत्तर प्रदेश में इसे करेल तथा कपास मृदा भी कहा जाता है | इसमें लोहा चूना, पोटैशियम, मैग्नेशियम, तथा एल्युमिनियम की मात्रा बहुत होती है | इसमें पैदा की जाने वाली मुख्य फसलें कपास, मूंगफली, सोयाबीन, तिलहन एवं गेहूं इत्यादि हैं|

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4. लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil): यह स्थान बद्ध मिट्टी है जो देश के लगभग 7% भूभाग पर पायी जाती है | इसमें लोहा, एल्युमिनियम, अधिक मात्रा में पाये जाते हैं तथा इसमें नाइट्रोजन, पोटाश, फास्फोरस, चूना आदि की कमी होती है | इसमें पैदा होने वाली मुख्य फसलें हैं :चाय, कहबा, रबर, काजू और सिनकोना आदि |

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5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil): ये मृदाएँ शुष्क तथा आर्द्र शुष्क प्रदेशों में पायी जाती हैं इस प्रकार की मृदाएँ मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी पंजाब के भागों में पायीं जातीं हैं | इस प्रकार यह मिट्टी 2.85 लाख किमी2 भूभाग में फैली है| पानी की कमी और अधिक तापमान के कारण ये मृदाएँ टूटकर बालू के कणों में विखंडित हो जातीं हैं | इसमें फास्फोरस अधिक मात्रा में पाया जाता है लेकिन इनमे जीवांश ईधन और नाइट्रोजन की कमी होती है |

6. पर्वतीय मृदाएँ (Hill Soil): इसका विस्तार भारत में लगभग 3 लाख वर्ग किमी में पाया जाता है | इसे वनीय मृदा भी कहते हैं | इस प्रकार की मिट्टियाँ कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली हई है | इसमें जीवांश अधिक मात्रा में पाये जाते हैं लेकिन फास्फोरस, पोटाश, चूना की कमी होती है | यह मृदा सेव, नाशपाती और अलूचा आदि के लिए अच्छी मानी जाती है |

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भारत में कौन सी मिट्टी कहां पायी जाती है इसका उल्लेख इस चित्र में किया गया है |

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Hemant Singh is an academic writer with 7+ years of experience in research, teaching and content creation for competitive exams. He is a postgraduate in International
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First Published: Nov 23, 2016, 17:47 IST

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