AI के दौर में कैसे बनें भविष्य के सफल इंजीनियर? IIT जम्मू के डायरेक्टर ने टिप्स बताए
IIT जम्मू के निदेशक मनोज सिंह गौड़ ने AI युग में सफल इंजीनियर बनने के लिए महत्वपूर्ण सलाह दी है। उन्होंने तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ क्रिटिकल थिंकिंग, रचनात्मकता और समस्या-समाधान कौशल पर जोर दिया, साथ ही यूनिफाइड इंजीनियरिंग मॉडल की बात की।
आज का युवा ऐसे समय में अपने करियर का चुनाव कर रहा है, जब दुनिया तेजी से बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आटोमेशन, रोबोटिक्स, डाटा साइंस, ऊर्जा संक्रमण और जलवायु चुनौती जैसे क्षेत्र में काम करने के लिए आज के इंजीनियर्स कैसे स्वंय को तैयार करें, बता रहे हैं आइआइटी जम्मू के निदेशक मनोज सिंह गौड़...
एआइ के इस युग में भले ही तकनीकी ज्ञान से समृद्ध होकर इंजीनियर बन रहे हैं, लेकिन क्रिटिकल थिंकिंग और रचनात्मकता के बगैर वे वास्तविक समाधान की ओर आगे नहीं बढ़ सकते हैं। देखिए, आने वाला समय तकनीक का है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इंजीनियर्स तकनीकी कोड या मशीनें बनाने वाले होंगे, बल्कि वे 'मानव-मशीन सहयोग', टिकाऊ विकास और जटिल समस्याओं के समाधान कर्ता होंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, और पर्यावरण-अनुकूल डिजाइन उनके काम के मुख्य केंद्र बिंदू होंगे।
भविष्य के इंजीनियर
आज के समय में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि आने वाले वर्षों में कौन-सी नौकरियां रहेंगी और कौन-सी समाप्त हो जाएंगी। असली प्रश्न यह है कि क्या हमारे युवा ऐसे कौशल विकसित कर रहे हैं, जिनकी आवश्यकता भविष्य में होगी? क्या वे स्वंय को ऐसे तैयार कर रहे हैं कि मशीन के प्रयोग के बावजूद मनुष्य की चिंतनशीलता के बगैर नवाचार करना संभव न हो?
कई भूमिकाएं निभाती हैं तकनीक
आजकल तकनीक कई नियमित और दोहराव वाली भूमिकाएं संभाल रही हैं। जैसे, AI कोड लिख सकता है, डाटा विश्लेषण कर सकता है, प्रारंभिक डिजाइन सुझा सकता है, यहां तक कि सामग्री भी तैयार कर सकता है, लेकिन क्या मशीन किसी स्थानीय समस्या की सामाजिक जटिलता समझ सकती है? क्या वह सीमित संसाधनों में कोई व्यावहारिक समाधान बना सकती है? क्या वह मानवीय संवेदनाओं, नैतिकता और तकनीकी निर्णयों के बीच संतुलन बना सकती है? इस खालीपन को भरने के लिए जरूरत है मानव संसाधन की। भविष्य उन युवाओं का होगा, जो केवल जानकारी याद रखने वाले नहीं, बल्कि समस्या पहचानने और समाधान करने वाले बनेंगे। जो टीम में मिलकर काम करेंगे और निरंतर सीखने का प्रयास जारी रखेंगे। इसलिए, समय आ गया है समस्याओं को समाधान के नजरिए से देखने का।
यूनिफाइड इंजीनियरिंग सीखा रहें संस्थान
लंबे समय तक हमारी तकनीकी शिक्षा का माडल विषय-केंद्रित रहा है। अलग-अलग पाठ्यक्रम, अलग-अलग प्रयोगशालाएं और अंत में एक डिग्री। इस माडल ने देश को मजबूत तकनीकी आधार तो दिया है, लेकिन बदलते समय में अब यह पर्याप्त नहीं है। उद्योग आज केवल विषय-ज्ञान नहीं, बल्कि समस्या-समाधान क्षमता, संवाद कौशल, डिजाइन सोच, सिस्टम समझ, नेतृत्व और उद्यमशीलता भी चाहता है। समस्त IIT इसी दिशा की ओर काम कर रहे हैं। हमारा प्रयास केवल इंजीनियर तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे युवा तैयार करना है, जो वास्तविक दुनिया की समस्याओं को समझ सके, अपने आस-पास हो रहे बदलावों को अनुभव करें और बहुविषयी दृष्टिकोण से समाधान निकाल सके।
इसी दृष्टि से हम यूनिफाइड इंजीनियरिंग (एकीकृत अभियांत्रिकी) जैसे नए शैक्षणिक माडल पर कार्य कर रहे हैं। इसका उद्देश्य इंजीनियरिंग को विषयों के अलग-अलग समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक समेकित समस्या-समाधान यात्रा के रूप में प्रस्तुत करना है।
वास्तविक इंजीनियर का आधार
कल्पना कीजिए कि कोई विद्यार्थी इंजीनियरिंग के पहले ही वर्ष में केवल सिद्धांत नहीं पढ़ता, बल्कि किसी वास्तविक उत्पाद को खोलकर समझता है, उसके घटकों की भूमिका पहचानता है, उसका डिजिटल मॉडल बनाता है, उसे दोबारा जोड़ता है और फिर सोचता है कि इसे और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है। यही सीख वास्तविक इंजीनियरिंग का आधार है।
आईडिया को उत्पाद में बदलते युवा
ऐसी शिक्षा में मेकर-स्पेस, रिवर्स इंजीनियरिंग, डिजाइन-थिंकिंग, परियोजना-आधारित सीखना और उद्योग-अनुभव स्वाभाविक रूप से शामिल होते हैं, लेकिन भविष्य की तैयारी केवल कक्षा तक सीमित नहीं हो सकती।
इसलिए, IIT जम्मू का इनोवेशन एंड इक्युबेशन डिजाइन एंड आंत्रप्रेनियरशिप सेंटर विद्यार्थियों को नवाचार और उद्यमशीलता की दिशा में भी अवसर प्रदान कर रहा है। यहां विद्यार्थी विचारों को केवल कागज पर नहीं लिखते या आंकते, बल्कि उन्हें प्रोटोटाइप, उत्पाद और संभावित उद्यम में बदलने की दिशा में काम करते हैं।
जिज्ञासा से जन्म लेता नवाचार
विशेष बात यह है कि यह सोच केवल संस्थान के विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है। स्कूल स्तर पर भी हाथों से सीखने, रोबोटिक्स, ड्रोन, डिसअसेंबली-रीअसेंबली और मेकर-आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से जिज्ञासा और नवाचार की संस्कृति विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है, क्योंकि नवाचार केवल तकनीकी दक्षता से नहीं, जिज्ञासा से जन्म लेता है। यदि भारत को सम्प्रभुत्व विकसित राष्ट्र और आत्मनिर्भर तकनीकी शक्ति बनना है और वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करना है, तो हमें ऐसे युवाओं की आवश्यकता है, जो नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि अवसर निर्माण करने वाले हों। भविष्य, परिवर्तन का इंतजार करने वालों का नहीं होता, उनका होता है जो परिवर्तन को दिशा देते हैं।
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