Search

सुप्रीम कोर्ट का फैसला, अयोध्या विवाद में होगी मध्यस्थता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में मध्यस्थता होगी. सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए तीन सदस्यों का पैनल बनाया है. कोर्ट ने कहा है कि एक हफ्ते के भीतर मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए.

Mar 8, 2019 10:48 IST
facebook IconTwitter IconWhatsapp Icon

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया है. एक हफ्ते के भीतर मध्यस्थता की प्रक्रिया को शुरू किया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए तीन सदस्यों का पैनल गठित किया है, जिसके अध्यक्ष जस्टिस खलीफुल्ला होंगे. इसके अलावा श्री श्री रविशंकर और श्रीराम पंचु भी पैनल में शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले की रिपोर्टिंग न की जाए.कोर्ट ने कहा है कि मध्यस्थता करने वाले तीन सदस्यीय पैनल को 4 हफ्तों में अपनी शुरुआती रिपोर्ट देनी होगी और 8 हफ्तों में अपनी पूरी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपनी होगी. कार्रवाही फैजाबाद (अयोध्या) में होगी और गोपनीय होगी. 06 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था.

मध्यस्थता के लिए बने पैनल में मौजूद ये तीन लोग कौन हैं?

जस्टिस खलीफुल्ला: इस पैनल के चेयरमैन जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला हैं. तमिलनाडु के रहने वाले जस्टिस खलीफुल्ला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं. जस्टिस खलीफुल्लाह ने 1975 में पहली बार वकालत शुरू की थी. साल 2000 में खलीफुल्ला मद्रास हाई कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किए गए. उसके बाद 2011 में, वह जम्मू और कश्मीर के हाई कोर्ट के सदस्य बने और उन्हें दो महीने बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया.

श्री श्री रवि शंकर: सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए श्री श्री रविशंकर का नाम भी दिया है. श्री श्री रविशंकर आध्यात्मिक गुरु है. उनकी संस्था का नाम आर्ट ऑफ लिविंग है.

श्रीराम पंचू: श्रीराम पंचू एक सीनियर वकील है और जाने माने मध्यस्थ हैं. वह द मेडिएशन चेम्बर्स के संस्थापक हैं, जो मध्यस्थता की सेवाएं देता है. इसके अलावा वो भारतीय मध्यस्थों के संघ के अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संस्थान (IMI) के बोर्ड में डायरेक्टर हैं. उन्होंने 2005 में भारत का पहला कोर्ट-एनेक्स मध्यस्थता सेंटर बनाया था. उन्होंने मध्यस्थता को भारत की कानूनी प्रणाली का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय बेंच ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद मध्यस्थता के लिए नाम सुझाने को कहा था. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली पांच जजों की बेंच के सामने पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि यह सही और विवेकपूर्ण नहीं होगा. उत्तर प्रदेश सहित हिंदू पक्षकारों ने भी अदालत के प्रस्ताव का विरोध किया था. राम लला की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सी.एस.वैद्यनाथन ने भी मध्यस्थता का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि भगवान राम की जन्मभूमि विश्वास व मान्यता का विषय है और वे मध्यस्थता में विरोधी विचार को आगे नहीं बढ़ा सकते.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संवैधानिक बेंच अयोध्या मामले की सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई कर रही संवैधानिक बेंच में सीजेआई रंजन गोगोई के अलावा न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं. सुनवाई के दौरान जस्टिस बोबडे ने कहा है कि इस मामले में मध्यस्थता के लिए एक पैनल का गठन होना चाहिए.

इससे पहले 26 फरवरी 2018 को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में मध्यस्थ के जरिए विवाद का समाधान निकालने पर सहमति जताई थी. कोर्ट ने कहा था कि एक फीसदी भी उम्मीद है तो मध्यस्थ के जरिए मामला सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए.

मध्‍यस्‍थता क्या है?

मध्‍यस्‍थता (Arbitraton) एक वैकल्पिक विवाद समाधान प्रक्रम है जिसमें पक्षकर किसी तीसरे व्‍यक्ति के हस्‍तक्षेप के माध्‍यम से तथा न्‍यायालय का सहारा लिए बिना अपने विवादों का निपटान करवाते हैं. यह ऐसी विधि है जिसमें विवाद किसी नामित व्‍यक्ति के सामने रखा जाता है जो दोनों पक्षों को सुनने के पश्‍चात अर्ध-न्‍यायिक तरीके से मसले का निर्णय करता हैं. समाधान समाधानकर्ता की सहायता से पक्षकारों द्वारा विवादों के सौहार्दपूर्ण निपटान की प्रक्रिया है.

 

इससे पहले 27 सितंबर 2018 को तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 2-1 के बहुमत से 1994 के एक फैसले में की गई अपनी टिप्पणी पर नए सिरे से विचार करने के लिए मामले को पांच न्यायमूर्तियों की खंडपीठ के पास भेजने से इंकार कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गयी है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 01 जनवरी 2019 को ही कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर के मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अध्यादेश लाने के बारे में निर्णय का सवाल उठेगा.

क्या था मामला?

  • इस्माइल फारूकी ने अयोध्या में भूमि अधिग्रहण को चुनौती दी थी जिस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष न्यायालय ने कहा था कि नमाज पढ़ना मस्जिद का अनिवार्य हिस्सा नहीं है.
  • मुस्लिम समुदाय इससे सहमत नहीं था और वह चाहता था कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर दोबारा से विचार करे.
  • सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों की ओर से दलील दी गई थी कि मस्‍जिद में नमाज़ मामले पर जल्द निर्णय लिया जाए.
  • मुस्लिम समुदाय यह भी चाहता था कि मुख्य मामले से पहले 1994 के इस फैसले पर सुनवाई हो. अयोध्या जमीन विवाद पर फैसला तथ्यों के आधार पर होगा.
  • सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को इस मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रखा था. इसके साथ ही राम जन्मभूमि में यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश दिया गया था, ताकि हिंदू धर्म के लोग वहां पूजा कर सकें.

 

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 में जो फैसला दिया था उसके खिलाफ हिंदू महासभा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. इससे पहले मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर कर रहे थे.

अयोध्या विवाद कब क्या हुआ?

वर्ष

विवाद

1949

बाबरी मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्तियां देखी गई. सरकार ने परिसर को विवादित घोषित कर भीतर जाने वाले दरवाज़े को बंद किया.

1950

फ़ैज़ाबाद अदालत में याचिका दायर कर मस्जिद के अंदर पूजा करने की मांग की गयी.

1959

निर्मोही आखड़ा ने याचिका दायर कर मस्जिद पर नियंत्रण की मांग की.

1961

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की याचिका, मस्जिद से मूर्तियों को हटाने की मांग की गयी.

1984

वीएचपी ने राम मंदिर हेतु जनसमर्थन जुटाने का अभियान शुरू किया.

1986

फ़ैज़ाबाद कोर्ट ने हिंदुओं की पूजा हेतु मस्जिद के द्वार खोलने के आदेश दिए.

1989

राजीव गांधी ने विश्व हिंदू परिषद को विवादित स्थल के क़रीब पूजा की इजाज़त दी.

1992

कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिराया और अस्थाई मंदिर का निर्माण किया.

2003

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने ASI को विवादित स्थल की खुदाई का आदेश दिया.

2010

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने विवादित ज़मीन को तीन भाग में बांटने के आदेश दिए, अलग-अलग पक्षकारों ने हाइकोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

 

2011

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के फ़ैसले को लागू करने पर रोक रहेगी. साथ ही विवादित स्थल पर सात जनवरी 1993 वाली यथास्थिति बहाल रहेगी.

2016

विवादित भूमि पर राम मंदिर के निर्माण को लेकर सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की.

2017

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने कहा कि अयोध्या विवाद मामले को आपसी बातचीत से सुलझा लेना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दिए गए इस्माइल फ़ारूक़ी फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के लिए तीन जजों की बेंच का गठन किया.

2018

सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद से जुड़े वर्ष 1994 वाले फ़ैसले पर पुनर्विचार से इनकार किया.

 

बता दें कि इससे पहले इस मामले की सुनवाई तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच कर रही थी. रिटायरमेंट से पहले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने इस मामले पर एक फैसले में कहा था कि यह मामला जमीन विवाद का है और इसे संवैधानिक बेंच को रेफर नहीं किया जाएगा.

 

यह भी पढ़ें: अमेरिका ने भारत को जीएसपी सूची से बाहर करने की घोषणा की

Take Weekly Tests on app for exam prep and compete with others. Download Current Affairs and GK app

एग्जाम की तैयारी के लिए ऐप पर वीकली टेस्ट लें और दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करें। डाउनलोड करें करेंट अफेयर्स ऐप

AndroidIOS