उच्चतम न्यायलय ने 28 अक्टूबर 2015 को मेडिकल के सुपर स्पेशएलिटी कोर्सेज में आरक्षण समाप्त करने का निर्देश दिया है. केंद्र और सभी राज्य सरकारों को दिए निर्देश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सुपर स्पेशएलिटी मेडिकल कोर्सेज को 'अनारक्षित, मुक्त और अबाध' रखा जाए. कई राज्य केवल अधिवासी (स्था्नीय निवासी) एमबीबीएस डॉक्टरों को ही सुपर स्पेशएलिटी कोर्सेज की प्रवेश परीक्षाओं में बैठने की इजाजत देते हैं, उच्चतम न्यायलय ने इसी शिकायत के मद्देनजर ये निर्देश दिया है.
न्यायधीश दीपक मिश्रा और पीसी पंत की पीठ ने ऐसे पाठ्यक्रमों में जाति, धर्म, निवास या किसी अन्य आधार पर आरक्षण नहीं दिए जाने के निर्देश दिए. एक अन्य मामले में डॉ प्रदीप जैन बनाम भारत सरकार, जिसमें उच्चतम न्यायलय ने आदेश दिया था कि सुपर स्पेशएलिटी मेडिकल कोर्सेज में प्रवेश का एक मात्र तकाजा मेरिट ही होगी, का हवाला देते हुए दो जजों की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार ने उस निर्देश को क्रियान्वित करने के लिए अब तक न कोई नियम बनाया न कोई दिशानिर्देश तय किए.
जजों की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आाजादी के 68 वर्षों बाद भी 'विशेषाधिकार' में कोई परिवर्तन नहीं आया है. केंद्र और राज्य सरकारों को यथास्थिति में बदलाव करने और मेरिट को सुपर स्पेशएलिटी कोर्सेज में एक मात्र मानदंड बनाने के लिए कई बार ताकीद की गई, लेकिन आरक्षण व्यवस्था में अब तक कोई बदलाव नहीं आया.
कोर्ट ने एमबीबीएस डॉक्टरों द्वारा दाखिल की गई एक याचिका पर ये फैसला दिया.
डॉक्टरों ने याचिका में कहा था कि भारत के अधिकांश हिस्सों में वे 'डॉक्टर ऑफ मेडिसिन' और 'मास्टर ऑफ सर्जरी' जैसे कोर्सेज की प्रवेश परिक्षाओं में बैठ सकते हैं, लेकिन आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, और तमिलनाडु केवल स्थारनीय निवासी डॉक्टरों की ही इजाजत देते हैं. उन्होंने कहा था कि इन राज्यों के निवासी डॉक्टर दूसरे राज्यों की परीक्षाओं में तो बैठ सकते हैं, लेकिन दूसरे राज्यों के निवासी डॉक्टर इन राज्यों में नहीं बैठ सकते हैं.
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