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भारत में मुद्रा की परिवर्तनीयता

प्रथम विश्व युद्ध से पहले पूरी दुनिया में स्वर्णमान (गोल्ड स्टैण्डर्ड) के मानक होते थे, जिसके तहत मुद्राओं का मूल्य सोने के रूप में एक स्थिर दर पर निश्चित किया जाता था । लेकिन 1971 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली की विफलता के बाद इस प्रणाली को बदल दिया गया। मुद्रा की परिवर्तनीयता से तात्पर्य एक ऐसी प्रणाली से है जिसके अंतर्गत एक देश की मुद्रा विदेशी मुद्रा में परिवर्तित हो जाती है और विलोमशः भी। 1994 के बाद से भारतीय रुपया चालू खाते के लेन-देन में पूरी तरह से परिवर्तनीय बना दिया गया।
May 11, 2016 17:00 IST
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प्रथम विश्व युद्ध से पहले पूरी दुनिया में स्वर्णमान (गोल्ड स्टैण्डर्ड) के मानक होते थे, जिसके तहत मुद्राओं का मूल्य सोने के रूप में एक स्थिर दर पर निश्चित किया जाता था । लेकिन 1971 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली की विफलता के बाद इस प्रणाली को बदल दिया गया। मुद्रा की परिवर्तनीयता से तात्पर्य एक ऐसी प्रणाली से है जिसके अंतर्गत एक देश की मुद्रा विदेशी मुद्रा में परिवर्तित हो जाती है और विलोमशः भी। 1994 के बाद से भारतीय रुपया चालू खाते के लेन-देन में पूरी तरह से परिवर्तनीय बना दिया गया।

सन 1971 में ब्रेटनवुड्स प्रणाली की विफलता के बाद बहुत से देशों ने गोल्ड आधारित विनिमय प्रणाली से हटकर अस्थायी विदेशी विनिमय दर प्रणाली की तरफ रुख कर लिया। अस्थायी या लचीली विनिमय दर प्रणाली के तहत, विभिन्न राष्ट्रीय मुद्राओं के बीच विनिमय दरों को बाजार में मांग और आपूर्ति के माध्यम से निर्धारित किया जाता है।

रुपये की परिवर्तनीयता:

1992-93 में पहली बार केंद्रीय आम बजट ने भारतीय रुपये को आंशिक रूप से विदेशी मुद्रा में परिवर्तनीय बना दिया था । यह विश्व के साथ कि भारतीय अर्थव्यवस्था के तत्कालीक एकीकरण हेतु एक अनिवार्य कदम था। इसी क्रम में भुगतान संतुलन में चालू खाते के गंभीर संकट अथवा घाटे की स्थिति से उबरने के लिए भारत सरकार ने 1 मार्च, 1992 से रुपये की आंशिक विनिमयता की शुरुआत की।

इस प्रणाली के तहत, जिसमें एक वर्ष की अवधि के लिए संचालन में बने रहने हेतु, मुद्रा आय का 60 फीसदी भाग बाजार से निर्धारित विनिमय दर पर रुपये में परिवर्तनीय था और शेष 40 प्रतिशत आय आधिकारिक तौर पर तय की गई विनिमय दर के आधार पर रुपये में परिवर्तनीय थी। एक मुद्रा की परिवर्तनीयता यह इंगित करती है कि इसे स्वतंत्र रूप से किसी भी अन्य विदेशी मुद्रा में परिवर्तित किया जा सकता है। परिवर्तनीयता का निर्धारण बाजार में मुद्रा की माँग और पूर्ति के आधार पर होता है।

चालू खाता परिवर्तनीयता: अर्थ

चालू खाते की परिवर्तनीयता का मतलब है कि मुद्रा की सीमा पार आवाजाही पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है।चालू खाता विनिमयता, लक्ष्यों, सेवाओं और आय के साधनों के अंतरराष्ट्रीय मुद्रा से संबंधित भुगतान पर प्रतिबंध हटाने से संबंधित है, जबकि पूंजी खाता परिवर्तनीयता का तात्पर्य यह है कि यदि कोई निवेशक (माना कि भारतीय) विदेशों में कोई संपत्ति खरीदना चाहता है तो उसको अपनी सरकार से उसके रुपया को विदेशी मुद्रा में परिवर्तित करना पड़ता है। यदि सरकार रुपया को विदेशी मुद्रा में परिवर्तित कर देती है तो वह विदश में संपत्ति खरीद सकता है अन्यथा नहीं ।

चालू खाता परिवर्तनीयता को निम्न अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए विदेशी मुद्रा बेचने अथवा खरीदने की स्वतंत्रता के रूप में परिभाषित किया गया है:

(क) इसमें मुख्य रूप से आयत, निर्यात  तथा अदृश्य व्यवहार आते हैं ।

(ख) अर्थात सभी चालू व्यापारिक लें देनों जिसमें यात्रा , शिक्षा, चिकित्सा, सम्बन्धी व्यय होते हैं

पूंजी खाता की परिवर्तनीयता- इसके अंतर्गत विदेशी सहायता (निवल) बाजार उधारी (निवल), अनिवाशी जमा  तथा अन्य पूंजी मदें आती हैं इस प्रकार पूंजी खाते की  परिवर्तनीयता का अर्थ हुआ प्रत्येक विदेशी व्यव्हार के लिए  बाजार की शक्तियों द्वारा  निर्धारित विदेशी विनिमय दर पर विदेशी की आपूर्ति ।

रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता का अर्थ- चालू खाते और पूंजी खाते पर होने वाले सभी व्यवहारों को पूरा करने के लिए रुपये को किसी भी स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में परिवर्तित करने कि स्वतंत्रता से है। पूंजी खाते पर परिवर्तनीयता का अर्थ हुआ पूंजी के अन्त्रप्रवाह तथा बहिर्गमन , भारतियों द्वारा भारत में संपत्ति को बेचना  तथा प्राप्त रुपया को देश के बाहर ले जाने पर या किसी विदेशी मुद्रा में अपना जमा रखने पर पूर्ण स्वतंत्रता । इस प्रकार पूंजी खाता की परिवर्तनीयता का अर्थ घरेलू वित्तीय संपत्तियों तथा विदेशी संपत्तियों को विदेशी संपत्तियों में बाजार निर्धारित विदेशी विनिमय दर पर बदलने की स्वतंत्रता से है ।

पूंजी खाता विनिमयता की वर्तमान स्थिति-

(क) भारत में प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश शुरू करने के लिए विदेशी निवेशकों और अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) के लिए पूंजी खाता विनिमयता मौजूद है।

(ख) विदेशों में 4 मिलियन अमेरिका डालर से अधिक के भारतीय निवेश को स्वत: ही कुछ शर्तों के साथ भारतीय रिजर्व बैंक की मंजूरी मिल जाती है।

(ग) सितंबर 1995 में, भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशों में 4 लाख डॉलर से अधिक के विदेशी निवेश या फास्ट ट्रैक मंजूरी के लिए अयोग्य लोगों के निवेश से जुड़े सभी आवेदनों की प्रक्रिया के लिए एक विशेष समिति का गठन किया था।

पूंजी खाता पर परिवर्तनीयता के सम्बन्ध में रिज़र्व बैंक द्वारा s s तारापोर कि अध्यक्षता में गठित समिति ने जून 1997 में कुछ निश्चित दशाओं की पूर्ति पर क्रमिक ढंग से पूंजी खाते पर परिवर्तनीयता कि सिफारिस की है समितीने जिन शर्तों का उल्लेख किया है वे हैं...

राजकोषीय घाटा का सकल घरेलु उत्पाद का 3.5% होना, स्फीति की दर का 5% होना , कुशल वित्तीय प्रणाली तथा विदेशी मुद्रा भंडार का कम से कम 26 बिलियन डॉलर का होना । समिति ने सुझाव दिया कि अभी पूंजी खाते पर  परिवर्तनीयता के लिए उपयुक्त समय नहीं है ।

पूंजी खाता परिवर्तनीयता (जुलाई 2006) पर तारापोर समिति की दूसरी रिपोर्ट:

1991 के बाद की अवधि में भुगतान संतुलन की बढ़ती ताकत के साथ और मजबूत बाह्य क्षेत्र और प्रत्येक वर्ष शक्ति में वृद्धि तथा उच्च विकास पूंजी नियंत्रण के लिए अनुकूल वातावरण में छूट मिलने के साथ के सापेक्ष मैक्रो आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद आरबीआई ने 20 मार्च 2006 को एक कमेटी का गठन किया जिसका अध्यक्ष श्री एस.एस तारापोर को बनाया गया था । कमेटी ने 31 जुलाई, 2006 को रिजर्व बैंक को अपनी रिपोर्च सौंपी।

समिति ने मौजूदा पूंजीगत अवरोधों की समीक्षा के बाद तीन चरणों में पूंजी परिवर्तनीयता की तरफ बढ़ने के लिए एक व्यापक  पंचवर्षीय योजना तैयार की ।

निष्कर्ष: उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत के पास अब तक का सर्वाधिक 360 बिलियन का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है। जो कि एक आरामदायक स्तिथि है परन्तु इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अभी भी भारत की अर्थव्यस्था दुनिया की अन्य बड़ी और मजबूत अर्थव्यस्थाओं के मुकाबले काफी कमजोर है इसलिए इसे पूंजी खाते में पूर्ण परिवर्तनीयता की अनुमति नहीं दी चाहिए ।