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राजपूतों की व्युत्पत्ति

'राजपूत' संस्कृत शब्द राज–पुत्र से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ होता है राजा का बेटा। राजपूत अपनी बहादुरी, निष्ठा और गौरव के लिए जाने जाते थे। वे योद्धा थे जिन्होंने युद्ध लड़े और शासकीय जिम्मेदारियों को निभाया। राजपूतों की व्युत्पत्ति पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में हुई थी। राजपूतों ने 6ठी से 12वीं सदी के बीच अपनी श्रेष्ठता का आनंद उठाया था। 20वीं सदी तक राजपूतों ने राजस्थान और सौराष्ट्र के कई हिस्सों पर राज किया था।
Nov 3, 2015 17:13 IST
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'राजपूत' संस्कृत शब्द राज–पुत्र से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ होता है "राजा का बेटा"। राजपूत अपनी बहादुरी, निष्ठा और गौरव के लिए जाने जाते थे। वे योद्धा थे जिन्होंने युद्ध लड़े और शासकीय जिम्मेदारियों को निभाया। राजपूतों की व्युत्पत्ति पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में हुई थी। राजपूतों ने 6ठी से 12वीं सदी के बीच अपनी श्रेष्ठता का आनंद उठाया था। 20वीं सदी तक राजपूतों ने राजस्थान और सौराष्ट्र के कई हिस्सों पर राज किया था।

6ठी सदी में, भारत जाति व्यवस्था में बंटा था। इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिए, वैश्य और शूद्र, चार जातियां होती थीं। ब्राह्मण उच्च जाति के हिन्दू थे जिनकी जिम्मेदारी सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों की थी। क्षत्रिय योद्धा होते थे, इनका काम युद्ध में लड़ना औऱ शासकीय जिम्मेदारियों का निर्वहन करना था। वैश्य कृषक, भूमि मालिक, व्यापारी और साहूकार होते थे। शूद्र हिन्दुओं की सबसे निचली जाति थी और इनका काम अपने उपर वाली तीनों जातियों की सेवा करना था। राजपूत क्षत्रियों की श्रेणी में आते हैं। उत्तरी भारत पर अपने शासन के दौरान राजपूतों ने उल्लेखनीय धार्मिक स्थलों, महलों और किलों का निर्माण कराया। राजपूतों को चित्रकारी और चित्रों का बहुत शौक था।

लगभग पूरे उपमहाद्वीप में राजपूतों की अच्छी खासी आबादी थी। ये विशेष रूप से उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में रहते थे। इनकी आबादी राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सौराष्ट्र, जम्मू, हरियाणा, मध्य प्रदेश और बिहार में पाई गई थी।
राजूपतों की उत्पत्ति बहस का विषय है। वी. पी. मलिका और एम. एस. नारावाने जैसे लेखकों ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड में उल्लेख नहीं मिलने के कारण 6 ठी शताब्दी ई. तक किसी विशेष समुदाय या सांप्रदायिक समूह को किसी एक समयावधि में नहीं बांधा । हिन्दू जाति व्यवस्था में घुसपैठियों के नेताओं और कुलीनों को क्षत्रिय कहा जाता था, हालांकि जाट, अहीर और गुर्जर जैसे अन्य– जिन्होंने उनके लिए देश आगमन की राह बनाई और उनकी (घुसपैठियों के नेताओं और कुलीनों) मदद की, को शूद्र का दर्जा दिया गया है। इसी समय, कुछ जन्मजात समुदायों को राजूपत के तौर पर वर्गीकृत किया गया था। चंदेल, राठौर और बुंदेला इनके कुछ उदाहरण हैं।

राजपूतों में समूह

राजपूत वंश और वमशा में बंटे हैं। वंश में भी सूर्यवंशी, अर्थात "सूर्य के घर" का प्रतीक हैं और ये भगवान राम के वंशज माने जाते हैं। चंद्रवंशी, अर्थात "चंद्रमा के घर" का प्रतीक हैं और ये भगवान कृष्ण के वंशज हैं और आखिरी वंश है अग्निवंशी यानि "अग्नि देवता का परिवार"।

वंश विभाजन के बाद छोटे– छोटे उप–विभाजन भी इस जाति में देखने को मिलते हैं। ये हैं कुल या शाख, खाम्प या खांप और नाक। कुल राजपूतों में प्राथमिक पहचान बताता है और इस वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार की देवी– जिन्हें कुल देवी कहते हैं, की पूजा करता है और कुल देवी उनके परिवार की रक्षा करती हैं।

सूर्यवंशियों के उप–विभाजन में आते हैं– बैस, छत्तर, गौर, कच्छवाहा, मिन्हास, पखराल, पटियाल, पुंडीर, नारु, राठौर और सिसोदिया। चंद्रवंशियों में भाटी, चंदेल, भंगालिया, चूड़ास्मा, जड़ाउंस, जडेजा, जार्राल, काटोत, पथोरे, सोम और तोमर। आखिर में अग्निवंशी इनमें भाल, चौहान, डोडिया, चावड़ा, मोरी, नागा, परमार और सोलंकी हैं।

राजपूत महिलाएं

राजपूत महिलाएं घरेलू काम काज के लिए होती हैं लेकिन वे युद्ध कुशल भी थीं और अगर सेना में पुरुषों की संख्या कम होती थी तो वे रणभूमि में जाने में नहीं हिचकची थीं। हालांकि, युद्ध में अगर राजा और उनके सभी सैनिक मारे जाते, तब राजपूत महिलाएं दूसरे शासकों की कैदी बनने की बजाए आत्महत्या करना पसंद करती थीं। इस अनुष्ठान को "जौहर" के नाम से जाना जाता था और इसे सिर्फ राजपूत महिलाएं ही कर सकती थीं।

राजपूत साम्राज्य

हिन्दू भारत में 11वीं से 16वीं सदी के बीच इस्लामी आक्रमण के दौरान राजपूत साम्राज्य पूरे मुस्लिम विजय के लिए बहुत बड़ी बाधा साबित हुआ था। मुगल शासक अकबर (1556–1605 ई.) के शासन काल में राजपूतों ने मुगल प्राधिकरण को स्वीकार कर लिया था और साम्राट के दरबार में उन्हें आने की अनुमति थी। अकबर की प्रशासन व्यवस्था और सेना में उन्हें ओहदे दिए गए। इसके अलावा सम्राट के साथ उनके सामरिक संबंधों और सामरिक संघों का गठन किया किया।
राजपूताना के सबसे प्रमुख शासक थे पृथ्वीराज चौहान। अपने पिता की मौत के बाद उसने तेरह वर्ष की अल्पायु में उनका स्थान लिया था।

वह बिना देखे सिर्फ आवाज सुनकर और बिना लक्ष्य को देखे, लक्ष्य भेदने की कुशल तीरंदाजी के लिए जाने जाते थे। अपनी सीमा के विस्तार और राजस्थान एवं हरियाणा के ज्यादातर हिस्सों को संगठित करने के दौरान उसने राजपूतों को मुसलमानों के आक्रमण के खिलाफ एकजुट किया था। शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी नाम का मुस्लिम आक्रमणकारी, जो आस– पास के साम्राज्यों पर कब्जा कर चुका था, पृथ्वीराज और उसके प्रदेशों के लिए खतरा बन गया था। तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज पराजित हुए और उन्हें बंदी बना लिया गया था। उन पर अत्याचार किए गए और लाल गर्म सलाखों से उनकी आंखें निकाल लीं गईं। इसके बाद, तीरंदाजी प्रतियोगिता में उन्होंने अपने लक्ष्य भेदन प्रतिभा का प्रदर्शन किया। गोरी ने पृथ्वीराज के इस प्रतिभा की प्रशंसा की। गोरी की आवाज सुनकर पृथ्वीराज ने गोरी की तरफ तीर चला दिया और उसी तीर ने गोरी की जान ले ली।

अन्य प्रख्यात शासक थे महाराणा प्रताप। वे मेवाड़ के राजा थे और उन्हें निडर योद्धा और कुशल रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता था। उन्होंने मुगलों से लड़ाई लड़ी और मृत्यु तक अपने प्रजा की मुगलों से रक्षा करते रहे। मुगलों के वर्चस्व का मुकाबला करने की योग्यता की कमी की वजह से राजपूतों का प्रभाव कम होता चला गया।

जब ब्रिटिश भारत पहुंचे, राजपूत राज्य उपनगर बन चुके थे जिन्होंने राजपूतों के शासनकाल को समाप्त कर दिया था। भारत की स्वतंत्रता (1947) के बाद, भारतीय संघ के राजस्थान राज्य के निर्माण हेतु राजूपताना के अधिकांश राजूपत राज्यों को मिला दिया गया था।