क्यों और कब हुई थी सूरत की संधि, यहां जानें सब कुछ

Last Updated: Jan 28, 2026, 17:53 IST

भारत के इतिहास में हमें कई महत्त्वपूर्ण संधियां देखने को मिलती हैं। इन संधियों में से एक सूरत की संधि भी शामिल है। क्या आप इस संधि के बारे में जानते हैं, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।

सूरत की संधि
सूरत की संधि

भारत का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें कई महत्त्वपूर्ण संधियां देखने को मिलती हैं। संधियों के माध्यम से दो पक्षों के बीच एक राजनीतिक और रणनीतिक समझौता होता था। कई बार इन संधियों की वजह से एक बड़े पक्ष को बहुत नुकसान भी उठाना पड़ता था। यही वजह थी कि भारत में अंग्रेज संधियों पर जोर देते थे। इन संधियों में से एक सूरत की संधि भी है। क्या आप जानते हैं कि कब और क्यों सूरत की संधि हुई थी, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।

सूरत की संधि की पृष्ठभूमि

पुणे के पेशवा नारायण राव की 18 साल की उम्र में ही उनके सैनिकों ने हत्या कर दी थी। इसके बाद उनके चाचा रघुनाथराव ने खुद को पेशवा घोषित कर दिया था। जांच के दौरान मराठा सम्राज्य के मुख्य न्यायाधीश रामशास्त्री प्रभुणे ने पाया कि नारायणराव की हत्या के पीछे रघुनाथराव का हाथ है। क्योंकि, वह खुद पेशवा बनना चाहता था।

 मंत्री परिषद् का हुआ गठन

उस समय मराठा साम्राज्य के चाणक्य कहे जाने वाले नाना फड़नवीस ने रघुनाथराव को सत्ता से हटाने के लिए 12 मंत्रियों की एक परिषद् बनाई थी। वहीं, नारायणराव की पत्नी गंगाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम सवाई माधवराव रखा गया। परिषद् ने इस नवजात शिशु को पेशवा घोषित कर दिया।

जब रघुनाथराव ने अंग्रेजों से मिलाया हाथ

रघुनाथराव इस घटना के बाद भागकर अंग्रेजों के पास पहुंचे और सत्ता के लालच में अंग्रेजों से खुद को पेशवा की गद्दी पर बैठाने की मदद मांगी। इस पर अंग्रेजों ने उनसे एक संधि करने के लिए कहा, जिसे हम सूरत की संधि(1775) के नाम से जानते हैं। 

क्या थी सूरत की संधि

सूरत की संधि के तहत अंग्रेजों ने रघुनाथराव को गद्दी पर बैठाने के बदले में साल्सेट और वसई के द्वीप देने का वादा लिया। यह पहली बार था, जब मराठा इतिहास में किसी ने गद्दी के लिए विदेशी ताकतों को आमंत्रित किया था।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध की शुरुआत

रघुनाथराव के निर्णय की वजह से मराठा और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ, जिसे हम पहला एंग्लो-मराठा युद्ध कहते हैं। हालांकि, मराठाओं ने तलेगांव की लड़ाई में अंग्रेजों को हरा दिया था।

1782 में हुई सालाबाई की संधि

अंग्रेजों और मराठाओं की बीच बार-बार युद्ध चलता रहा। हालांकि, 1782 में सालाबाई की संधि हुई, जिसमें अंग्रेजों ने सवाई माधवराव को ही असली पेशवा माना और अगले 20 वर्षों तक मराठा और अंग्रेजों के बीच कोई युद्ध नहीं हुआ।

वहीं, रघुनाथराव को हार माननी पड़ी। उन्हें एक निश्चित 25 हजार रुपये की पेंशन देकर अहमदनगर जिले के कोपरगांव भेज दिया गया था। साथ ही, इस घटना के बाद रघुनाथराव ने राजनीति और शासन से संन्यास से ले लिया था। 

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Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Jan 28, 2026, 17:53 IST

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