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खाद्य प्रसंस्करण उद्योग : क्षेत्र, योजनाएं और चुनौतियाँ

एक अनुमान के अनुसार, परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन की अपर्याप्त सुविधाओं के कारण कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत हर साल बर्बाद हो जाता है.अगर इन कमियों को दूर किया जाय तो इस क्षेत्र में विकास की एक बड़ी संभावना है.

Nov 9, 2017 11:32 IST
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नवंबर 2017 में  केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) ने नई दिल्ली में सफलतापूर्वक वर्ल्ड फूड इंडिया 2017 का आयोजन किया.  इस तीन दिवसीय लंबे आयोजन में इसमें भाग लेने वाले देशों तथा पेप्सीको, नेस्ले, कारगिल जैसे प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए 'विश्व खाद्य फैक्ट्री' बनने की भारत की क्षमता का प्रदर्शन किया गया. इस आयोजन के दौरान एमओएफपीआई और निजी क्षेत्र के बीच  50 एमओयू के अतिरिक्त 11.25 अरब डॉलर मूल्य का व्यापार का लेनदेन किया गया. गौरतलब है कि विभिन्न राज्य सरकारों ने इस दौरान 2.5 अरब डॉलर के एक अतिरिक्त एमओयू पर हस्ताक्षर किए.

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अतः इस सन्दर्भ में सरकार द्वारा समर्थित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की योजनाओं और कार्यक्रमों के दायरे एवं सरकार द्वारा इस क्षेत्र में अपने सपने को साकार करने में किस तरह की चनौतियों का सामना करना पड़ सकता है ? को जानने की कोशिश करते हैं.

भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का क्षेत्र

एक अनुमान के अनुसार भारत का वर्तमान खाद्य प्रसंस्करण उद्योग अनुमानतः 130 अरब अमरीकी डालर है और इससे घरेलू और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने की उम्मीद है. आने वाले वर्षों में संसाधित भोजन की मांग में वृद्धि ,खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विकास की संभावना के कुछ मुख्य कारक हैं –

• भारत 1.25 अरब से अधिक आबादी वाला देश है. बढ़ते मध्यम वर्ग के पास काफी डिस्पोजेबल आय है जो घरेलू बाजार क्षेत्र में 1.25 अरब के अवसर प्रदान करता है.

• दूध, घी, अदरक, केला, अमरुद, पपीता और आम आदि फलों के उत्पादन में भारत का पहला स्थान है. इसके अतिरिक्त दुनिया में चावल, गेहूं और कई अन्य सब्जियों और फलों के उत्पादन में भारत का स्थान दूसरा है. यदि अनाज, फलों, सब्जियों, दूध, मछली, मांस और पोल्ट्री आदि के अधिशेष उत्पादन को संसाधित कर देश में तथा देश के बाहर के बाजार में भेजा जाय  तो इस क्षेत्र के विकास हेतु अधिक अवसर प्राप्त होंगे.

• तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण मूल्य-वर्धित खाद्य पदार्थों से जुडी फूड हैविट्स दिनोदीन बदलती जा रही है. इस बदलाव का मुख्य कारण यह है कि भारत की 65% से अधिक आबादी 35 या उससे कम उम्र की है तथा यह वर्ग संसाधित भोजन को पसंद करता है.

• चीन के बाद  भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. विश्व बैंक की ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस के व्यावसायिक रैंकिंग में 130  से बढ़कर 100 वां स्थान, देश में अनुकूल कारोबारी माहौल को इंगित करता है और इस क्षेत्र में विदेशी निवेश को आकर्षित करने की संभावना को भी प्रदर्शित करता है.

• एक अनुमान के अनुसार, परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन की अपर्याप्त सुविधाओं के कारण कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत हर साल बर्बाद हो जाता है.अगर इन कमियों को दूर किया जाय तो इस क्षेत्र में विकास की एक बड़ी संभावना है.

रोजगार के अवसरों पर ऑटोमेशन का प्रभाव : विश्लेषण

उपर्युक्त कारकों का लाभ उठाने के लिए सरकार ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के विकास के लिए निम्नलिखित उपायों की शुरुआत की है-

प्रधान मंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY): अगस्त 2017 में  सीसीईए(CCEA) ने PMKSY को अपनी मंजूरी दे दी. इसमें कई योजनायें जैसे मेगा फूड पार्क, इंटिग्रेटेड कोल्ड चेन, वैल्यू एडिशन   इंफ्रास्ट्रक्चर, फूड सेफ्टी और क्वालिटी एश्योरेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर, एग्रो प्रसंस्करण क्लस्टर के लिए बुनियादी ढांचा, पिछड़े और फॉरवर्ड लिंकेज के निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण के निर्माण और उसके विस्तार को लेकर चल रही योजनाएं शामिल हैं.

मेगा फूड पार्क स्कीम :  इसका उद्देश्य कृषि उत्पाद को बाजार से जोड़ने के लिए किसानों, प्रोसेसर और खुदरा विक्रेताओं को एक साथ जोड़कर वैल्यू एडिशन में वृद्धि के साथ साथ अपव्यय को कम करने, किसानों की आय में वृद्धि करना और विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर पैदा करने के लिए एक अवसर प्रदान करना है. एक मेगा फूड पार्क में न्यूनतम 50 एकड़ का क्षेत्र होता है और यह हब और प्रवक्ता मॉडल के आधार पर क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण के तहत कार्य करता है.

कोल्ड चेन, मूल्य संवर्धन और संरक्षण अवसंरचना की योजना: इस योजना का उद्देश्य उपभोक्ता को किसी भी प्रकार के अवरोध के बिना एकीकृत शीत शृंखला और संरक्षण बुनियादी सुविधाओं की सुविधा प्रदान करना है. इसमें प्री-कूलिंग सुविधाओं को उत्पादन स्थल, रीफर वैन्स, मोबाइल कूलिंग इकाइयों के साथ-साथ वैल्यू एडिशन सेंटर में भी शामिल किया गया है.

बूचड़खानों का आधुनिकीकरण योजना: इस योजना का मुख्य उद्देश्य वेस्टेज में कमी लाने तथा प्रोसेसिंग वैल्यू एडिशन में वृद्धि के लिए प्रसंस्करण, संरक्षण क्षमता और मौजूदा खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों का विस्तार तथा आधुनिकीकरण करना है

• मेक इन इंडिया अभियान के हिस्से के रूप में  खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की पहचान 25 फोकस क्षेत्रों में से एक के रूप में की गई थी. इसलिए  इस क्षेत्र में वित्तीय, तकनीकी और मानव संसाधनों को आकर्षित करने के लिए नीतिगत पारिस्थितिकी तंत्र का पुनरीक्षण किया गया. इस क्षेत्र में ऑटोमेटिक रूट के माध्यम से 100% एफडीआई को अनुमति दे इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया.

• मेगा और नामित फूड पार्कों में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को सस्ती क्रेडिट मुहैया कराने के लिए, वित्त वर्ष 2014-15 में नामित 2,000 करोड़ रुपए के नाबार्ड के एक विशेष कोष को खाद्य प्रसंस्करण निधि के रूप में नामित किया गया था.

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उपर्युक्त योजनाओं और उपायों के बावजूद खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र निम्नलिखित चुनौतियों का सामना कर रहा है-

पर्याप्त बुनियादी ढांचें का अभाव : हालांकि सरकार ने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग संबंधी बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कई उपायों की शुरुआत की है, लेकिन वे इस क्षेत्र की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. कोल्ड स्टोरेज,सड़क और रेल संपर्क की कमी अभी भी एक बड़ी चिंता का विषय है.

क्रेडिट की सुविधाएं :  कुछ साल पहले खाद्य प्रसंस्करण कोष बनाने के बावजूद  इस क्षेत्र में संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ रहा है. यद्यपि विदेशी निवेश अभी भी इस उद्योग की आवश्यकताओं से मेल नहीं खाता है.
व्यापक नीति का अभाव : खाद्य प्रसंस्करण उद्योग एक उभरता हुआ क्षेत्र है. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने वाली एक व्यापक नीति का अभाव इसके विकास में बाधा डाल रहा है. एमओएफपीआई को नीतिगत कमी को दूर करने के लिए जल्द से जल्द राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण नीति की घोषणा करनी चाहिए.

निष्कर्ष

एक अनुमान के अनुसार, भारत की खाद्यान्न की खपत वर्तमान में 370 बिलियन अमरीकी डॉलर है और 2025 तक 10 खरब अमरीकी डालर तक पहुंचने की उम्मीद है.खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का विकास आवश्यक है क्योंकि इससे मध्यम वर्ग के डिस्पोजेबल आय में वृद्धिके के कारण भोजन की आदतों में परिवर्तन और तेजी से शहरीकरण, संसाधित और पैक किए गए भोजन की दिशा में बदलते भोजन संबंधी प्राथमिकताएं और इसके अलावा  उच्च स्तर के प्रसंस्करण वाले एक सुप्रसिद्ध खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अपव्यय को कम करने, मूल्य वृद्धि में सुधार, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने, किसानों को बेहतर रिटर्न सुनिश्चित करने, रोजगार को बढ़ावा देने के साथ-साथ निर्यात आय में भी वृद्धि होती है. यह क्षेत्र खाद्य सुरक्षा, खाद्य मुद्रास्फीति के गंभीर मुद्दों को हल करने और जनता को पौष्टिक भोजन प्रदान करने में सक्षम है.

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