अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने हाल ही में वैश्विक मजदूरी पर अपनी नवीन रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के अनुरूप, वर्ष 2012 के बाद से वैश्विक वेतन वृद्धि दर में लगातार कमी देखी जा रही है, जो वर्ष 2012 के 2.5 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2015 में 1.7 प्रतिशत तक आ गई. अंततः यह विगत चार वर्षों में अब तक का सबसे न्यूनतम स्तर है.
रिपोर्ट से संबंधित मुख्य तथ्य:
• इस डाटा के अनुसार भारत में महिला मजदूरों को पुरुष मजदूरों के मुकाबले 33 फीसदी कम वेतन मिलता है. इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि विश्व के देशों के मुकाबले भारत में महिला मजदूरों को पुरुष मजदूरों के मुकाबले काफी कम वेतन मिलता है.
• आईएलओ की रिपोर्ट के अनुसार ऐसा हो सकता है कि महिलाओं की शिक्षा के स्तर में कमी या फिर कार्य अनुभव में अंतर की वजह से वेतन में ये अंतर हो, लेकिन शैक्षिक अंतर ही इस मामले की अहम भूमिका नहीं है.
• भारत में शिक्षा को लेकर महिलाओं तथा पुरुषों की शैक्षिक योग्यता में अंतर बहुत तेजी से संकुचित हो रहा है. जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि महिला स्नातकों की संख्या पुरुष स्नातकों के मुकाबले पिछले दशक भर में दो गुनी हुई है.
• नॉन टेक्निकल क्षेत्र में भी पुरुषों के मुकाबले सबसे ज्यादा पोस्ट ग्रेजुएट महिलाएं ही हैं. महिला मजदूरों में वेतन का ये अंतर निचले स्तर तक है. हालांकि मनरेगा के तहत महिला और पुरुष मजदूरों को वेतन का अंतर कम करने की कोशिश की गई थी.
• रिपोर्ट के मुताबिक भारतीयों महिलाओं को 63 फीसदी कम वेतन मिला है लेकिन इनमें 15 फीसदी ज्यादा वेतन है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हाल ही में जिन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की है उनमें पुरषों के मुकाबले ज्यादा महिला डॉक्टर और शिक्षक हैं.
• भारत में वेतन असमानता केवल लिंग अनुपात की वजह नहीं है. देश के आधे से ज्यादा मजदूर जिन्हें कम वेतन मिलता है उनका आंकड़ा करीब 17.1 फीसदी है. वहीं टॉप 10 फीसदी मजदूरों को 42.7 फीसदी मजदूरी मिलती है.
• आईएलओ द्वारा यह रिपोर्ट प्रत्येक दो वर्षों में प्रकाशित की जाती है. इस रिपोर्ट से निकलने वाला एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि जी-20 के वैसे देश जो 2008-09 की आर्थिक मंदी में बहुत अच्छे स्थिति में थे, अब वेतन वृद्धि दर में गिरावट की मार झेल रहे हैं.
निष्कर्ष:
न्यूनतम मज़दूरी एवं सामूहिक संविदा के लिए अत्यधिक पारिश्रमिक असमानताओं को कम करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण सुधार किये जा सकते हैं. इन सबके आलावा, उन कमियों की पहचान करते हुए समाधान के उपाय निकाले जाने चाहियें जो पुरुषों और महिलाओं के बीच पारिश्रमिक-असमानता को बढ़ावा देते हैं. इन परिस्थितियों में पारिश्रमिक का नियमन करना चाहिये. दीर्घकालिक उद्यमों की उत्पादकता को बढ़ाने के प्रयास भी किए जाने चाहिए.

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