सरकार ने 10 जांच एजेन्सियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में किसी भी व्यक्ति के टेलीफोन और कंप्यूटर डाटा की जांच के लिए अधिकृत किया है लेकिन इसके लिए पहले की तरह गृह मंत्रालय से अनुमति लेना जरूरी होगा.
गृह मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि 21 दिसंबर 2018 को जारी आदेश वर्ष 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार द्वारा बनाये गये और तब से प्रचलित नियमों पर ही आधारित है. इस आदेश में किसी भी जांच एजेन्सी को नये अधिकार नहीं दिये गये हैं. आदेश से संबंधी अधिसूचना सेवा प्रदाताओं और मध्यवर्ती संस्था आदि को सूचित करने और मौजूदा आदेशों को संहिताबद्ध करने के लिए जारी की गयी थी.
क्या कहता है आईटी एक्ट? |
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फैसले पर विपक्ष का पक्ष
गृह मंत्रालय द्वारा इस आशय की अधिसूचना जारी किये जाने के बाद विपक्षी दलों ने संसद में इसको लेकर हंगामा किया. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार जांच एजेन्सियों को दुरूपयोग कर अब किसी भी व्यक्ति के डाटा की जांच करवा सकती है क्योंकि इसके लिए सक्षम अधिकारी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी.
सरकार का पक्ष
सरकार ने इस पर संसद में और बाहर भी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि आदेश से संबंधित अधिसूचना में जांच एजेन्सियों को कोई नया अधिकार नहीं दिया गया है और गृह मंत्रालय ने जांच की अनुमति देने का अधिकार अपने पास ही रखा है.
वित्त मंत्री अरूण जेटली ने राज्यसभा में कहा कि यह आदेश हर व्यक्ति और हर कंप्यूटर के लिए नहीं है बल्कि केवल राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मामलों में ही लागू होगा. यह आदेश वर्ष 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय में बनाये गये कानून पर ही आधारित है और इसे फिर से लागू किया गया है. उन्होंने कहा कि इसमें उन्हीं एजेन्सियों के नाम शामिल किये गये हैं जिन्हें 2009 के कानून में भी इस तरह की जांच का अधिकार दिया गया था.
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