विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र मानव बस्ति कार्यक्रम (यूएन– हैबिटेट) ने संयुक्त रूप से 31 मार्च 2016 को ग्लोबल रिपोर्ट ऑन अर्बन हेल्थ : इक्विटेबल, हेल्दियर सीटीज फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट, 2016 शीर्षक से रिपोर्ट जारी की.
इस रिपोर्ट में डब्ल्यूएचओ/ यूएन– हैबिटेट की 2010 के संयुक्त रिपोर्ट, ग्लोबल रिपोर्ट- हिडेन सीटीज : अनमास्किंग एंड ओवरकमिंग अर्बन हेल्थ इनइक्वैलिटी– को, शहरी स्वास्थ्य असमानता पैटर्न के नवीनतम साक्ष्यों एवं उनके सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय निर्धारकों के साथ अपडेट किया गया है.
यह रिपोर्ट सतत विकास एजेंडा 2030 में निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वैश्विक शहरी स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त कर संयुक्त कार्रवाई हेतु अवसरों के बारे में जानकारी देती है.
यूएनजीए (UNGA) ने सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा : ट्रांसफॉर्मिंग आवर वर्ल्ड को अपनाया
शहरी स्वास्थ्य 2016 से सम्बंधित मुख्य तथ्य
• राष्ट्रीय स्तर पर धन हमेशा शहरी स्तर पर स्वास्थ्य के लिए शर्तों का निर्धारण नहीं करता.
• कम और मध्यम– आमदनी वाले देशों में मेगासीटीज में स्वास्थ्य की स्थितियां छोटे शहरों के मुकाबले बहुत खराब है.
• स्वास्थ्य के लिए स्थितियों में बहुत अंतर है. यहां तक कि यह अंतर एक जैसे भौगोलिक क्षेत्र में पड़ने वाले शहरों के बीच भी पाया जाता है.
• वर्ष 2014– 2015 के इबोला प्रकोप से प्रभावित देशों की राजधानियों की स्थिति स्वास्थ्य के लिए सबसे खराब स्थितियां में से एक थी.
• हर जगह शहरों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्थक प्रगति हासिल करना स्वास्थ्य असमानता को कम करने पर निर्भर करता है.
• वैश्विक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में आगे बढ़ने के लिए शहरी गरीबों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान देना अनिवार्य है.
• संचारी रोगों के खिलाफ जंग में शहरों को नेतृत्व की भूमिका निभानी ही होगी.
• गैर संचारी रोग न सिर्फ मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं बल्कि ये शहरों के आर्थिक निहितार्थ पर भी बहुत प्रभाव डालते हैं.
• शहरों की अल्पपोषण और अतिपोषण की अभूतपूर्व दोहरी चुनौती की समस्या तेजी से बढ़ रही है.
• महत्वपूर्ण वैश्विक प्रगति के बावजूद, सुरक्षित एवं सतत जल तक पहुंच में कमी और स्वच्छता, शहरों के लिए तत्काल चुनौती बना हुआ है.
• शहरों को इस प्रकार डिजाइन किया और उनका प्रबंध किया जा सकता है कि वे स्वास्थ्यकर व्यवहार अपनाने में सक्षम हों और बेहतर स्वास्थ्य के परिणाम प्राप्त कर सकें.
• शहरी परिवहन को स्वास्थ्यकर, सुरक्षित और अधिक स्थायी रूप में परिवर्तित किया जा सकता है.
• लक्षित आवास हस्तक्षेपों, स्वच्छ ऊर्जा का अधिक उपयोग और बेहतर सामर्थ्य, स्वस्थ एवं स्थायी शहरी आवास की वैश्विक चुनौति से निपटने में मदद कर सकते हैं.
• खराब सुरक्षा और शहरी हिंसा शहरी आबादी और जिस समाज में वे रहते हैं, उनके स्वास्थ्य के लिए काफी महंगा साबित होते हैं.
• शहरी प्रशासन पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए सूचना साझा करने एवं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (सरकारी निजी भागीदारी) के द्वारा नागरिकों को सशक्त बनाने का सुझाव रिपोर्ट में दिया गया है.
भारत के संबंध में रिपोर्ट
• वर्ष 2031 तक भारत की शहरी आबादी के 2014 के 380 मिलियन (33 फीसदी) से बढ़कर 600 मिलियन (करीब 40 फीसदी) हो जाने का अनुमान है.
• ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में 15– 19 वर्ष की प्रवासी लड़कियों के इसी उम्र की गैर– प्रवासियों के मुकाबले चिकित्सा संस्थानों में स्वास्थ्य सुविधा के लिए कम जाने की संभावना है.
• भारत जैसे विशालकाय देश में शहरों की मलिन बस्तियों और वंचितों के क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण मामलों के विषय में नागरिक समाज और स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका सरकारी एजेंसियों के जैसी ही महत्वपूर्ण होगी.
• भारत में जहां विश्व के सबसे अधिक टीबी के मरीज हैं, मुबंई शहर में MDR-TB के सबसे अधिक मरीज हैं. वर्ष 2014 में मुंबई में MDR-TB के 2951 मामले दर्ज किए गए, जो पूरे देश में दर्ज किए गए मामलों के 12 फीसदी से भी अधिक है.
• भारत में शहरीकरण और उससे संबंधित जीवनशैली में बदलाव ने गैर संचारी रोगों (एनसीडी) के लिए स्वास्थ्य संक्रमण को बढ़ाया है. शहरी क्षेत्रों में अब मौत की दो मुख्य वजहें– हृदयरोग (सीवीडी) और कैंसर हैं.
• वर्ष 2014 और 2050 के बीच भारत के शहरी आबादी में 404 मिलियन लोगों के जुड़ने की उम्मीद है.
• वर्ष 2012 और 2030 के बीच हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, सांस संबंधी पुरानी बीमारियां और मानसिक स्वास्थ्य परिस्थितियों पर 6.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के खर्च आने का अनुमान है.
• हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य सबसे बड़े आर्थिक खतरों की वजह बनते हैं. इसके बाद श्वसन संबंधी बीमारियां और कैंसर का स्थान आता है.
• वर्ष 2050 तक विश्व में कारों, हल्के ट्रकों और अन्य मोटर वाहनों की संख्या के 2.1 बिलियन हो जाने की उम्मीद है. इनमें से ज्यादातर बढ़ोतरी एशियाई देशों खासकर चीन और भारत में होगा.
• सड़क हादसों में पैदल चलने वाले और साइकिल चलाने वालों की होने वाली मौत का प्रतिशत कम– से– कम 44 है लेकिन मुबंई में यह 60 फीसदी तक है.
• प्रति एक लाख निवासियों में यातायात मौत के मामले में चेन्नई विश्व का दूसरा शहर है. जबकि 27.2 मौतों के साथ फोर्टालेज (ब्राजील) पहले स्थान पर है. चेन्नई में मरने वालो की संख्या के 26.6 रहने का अनुमान लगाया गया था.
• यातायात से होने वाली अधिक मौतों वाले अन्य भारतीय शहर हैं– जयपुर (25.5), इंदौर (13.0), कोलकाता (9.4), दिल्ली (9.4), बेंगलुरु (8.9), पुणे (5.2), सूरत (5.0), अहमदाबाद (4.8) और मुंबई (3.2).
• भारत के शहरों, घर के भीतर और बाहर दोनों, में महिलाओं पर होने वाले शारीरिक एवं यौन हिंसा की दर समृद्ध क्षत्रों की तुलना में मलिन बस्तियों में लगभग दुगनी है.
• आबादी की मांग पूरा करने में सरकारी सेवा के प्रावधान अपर्याप्त हैं. भारत के शहरों को अपग्रेड करने और रखरखाव की मुख्य बाधा राजनीतिक है.
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