भारतीय रिज़र्व बैंक ने 1 सितंबर 2015 को आधार मूल्य की गणना के लिए एक नया प्रस्ताव दिया. यह सीमांत लागत पर आधारित कार्यप्रणाली है.
इस नयी कार्यप्रणाली का उद्देश्य बैंकों के आधार मूल्य में समानता लाना है ताकि वे आरबीआई के कैश रिज़र्व रेशो (सीआरआर) एवं स्टेचुरी लिक्विडिटी रेशो (एसएलआर) आदि में आवश्यक बदलाव कर सकें.
वर्तमान में आधार मूल्य की गणना करने के लिए विभिन्न बैंक विभिन्न प्रणालियों का प्रयोग कर रहे हैं. इस प्रस्तावित प्रणाली में फंड की लागत, सीआरआर/ एसएलआर का नेगेटिव तथा निर्धारित मूल्य पर औसत लागत शामिल होंगे.
यह नई प्रणाली 1 अप्रैल 2015 से प्रभावी मानी जाएगी.
आधार मूल्य
इसे बैंक की न्यूनतम ब्याज दर के रूप में परिभाषित किया जाता है जिससे कम ऋण देना बैंक के लिए व्यवहार्य नहीं है.
इसे आरबीआई द्वारा 1 जुलाई 2011 को आरंभ किया गया था.
इसे प्राइम लेंडिंग रेट के स्थान जारी किया गया था जो केवल उन ग्राहकों के लिए थी जो बैंक के सबसे अधिक भरोसेमंद ग्राहक माने जाते थे.
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