पिलपंतरी गांव : एक अनोखी परंपरा का सृजक

Apr 8, 2015, 15:07 IST

दक्षिणी राजस्थान के एक गांव ने महिला सम्मान और पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में एक नई मिसाल कायम की है

दक्षिणी राजस्थान के एक गांव ने महिला सम्मान और पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में एक नई मिसाल कायम की है. राजसमंद जिले के पिपलंतरी नामक गांव में बालिका शिशु के जन्म के समय एक सौ ग्यारह पेड़ लगाने की परंपरा है. बालिका शिशुओं के सम्मान में पेड़ लगाने की अपनी इस अनोखी परंपरा के कारण मार्च 2015 में ये गांव सुर्खियों में रहा. उसी समय ‘इंडियाज डॉटर’ नामक एक वृत्तचित्र पर देश भर में बहस छिड़ी थी, जिसमें महिलाओं के विरूद्ध हिंसा, बलात्कार और उनके अपमान जैसे विषय उठाए गए थे. इसी क्रम में गांव की इस परंपरा ने पुरे देश का ध्यान केन्द्रित करने को विवश किया.


क्या है ये परंपरा ?


गांव  के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालिवाल ने सन् 2006 में पहली बार अपनी बेटी की याद में पेड़ लगाए जिसका कुछ ही महीने पहले देहांत हुआ था. यहीं से शिशु जन्म के समय पेड़ लगाने की परंपरा का जन्म हुआ. इस गांव में एक मानव जन्म के साथ साथ एक और ग्यारह वृक्षों के जीवन की शुरुआत भी होती है और गांव दोनों की रक्षा और सेवा करता है.


बालिका शिशु के जन्म के साथ ही उसकी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की जिम्मादारी गांव की हो जाती है. गांव के लोग मिलकर 2100 रुपये और बच्ची के परिवार से 1000 रुपये यानी कुल 3100 रुपये जमा किए जाते हैं जिसे 20 वर्षों के लिए बैंक में जमा कर दिया जाता है. बच्ची की सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए परिवारवालों से एक हलफनामे पर हस्ताक्षर भी कराए जाते हैं जिसमें  उसकी उचित शिक्षा और विधि सम्मत आयु तक पहुंचने के बाद ही  उसकी शादी करवाने की बात कही गई होती है. वहीं दूसरी ओर गांव के लोग उन पेड़ों की देखभाल भी करते रहते हैं. बच्ची के जन्म के समय लगाए गए पेड़ों को दीमकों से बचाने के लिए उसके चारों ओर एलोवेरा के पौधे लगाए जाते हैं.


गांव में पेड़ लगाने की ये परंपरा दो महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करती है. एक ओर जहां समाज में महिलाओं को उचित सम्मान दिलाने की दिशा में यह सशक्त और आकर्षक कदम है वहीं पेड़ लगाने की अनोखी रीत की शुरुआत करके पूरे देश को पर्यावरण की सुरक्षा करने का एक संदेश भी है. पिछले 6 वर्षों में इस इलाके में ढाई लाख से भी ज्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं.


समीक्षा


पालिवाल द्वारा इस परंपरा की शुरुआत नारी सम्मान के बहाने पर्यावरण सुरक्षा का एक अदभुत प्रयोग है,जिसने महिला सशक्तिकरण  का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है.ऐतिहासिक रूप से बालिका शिशु के जन्म को परिवार के लिए एक बोझ माना जाता रहा है. यह परंपरा बालिकाओं का सम्मान करती है और कुल मिलाकर अच्छे पर्यावरण के निर्माण में भी सहायक सिद्ध हो रही है.

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