माओवादी पार्टी के उपाध्यक्ष डा बाबूराम भट्टराई 28 अगस्त 2011 को नेपाल के 35वें प्रधानमंत्री निर्वाचित किए गए. चुनाव में उन्होंने नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार आरसी पौडयाल को पराजित किया. कुल पड़े 574 मतों में से 340 मत 57 वर्षीय डा बाबूराम भट्टराई के पक्ष में पड़े, जबकि नेपाली कांग्रेस के संसदीय दल के नेता पौडयाल को सिर्फ 235 मत प्राप्त हुए. डा बाबूराम भट्टराई ने वर्ष 2008 में हुए संविधान सभा के चुनाव में गोरखा के निर्वाचन क्षेत्र संख्या 2 से माओवादी पार्टी से निर्वाचित हुए थे. माओवादी अध्यक्ष प्रचंड के नेतृत्व में वर्ष 2008 में बनी सरकार में डा बाबूराम भट्टराई उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री थे. वह माओवादी पार्टी के उदारवादी नेता हैं.
डा बाबूराम भट्टराई का संक्षिप्त परिचय: पश्चिमी नेपाल के गोरखा जिले से आने वाले डा बाबूराम भट्टराई नेपाल के शाही परिवार के भी नजदीक रहे. इन्होंने वर्ष 1970 में अमर ज्योति जनता सेकेंड्री स्कूल से 10वीं की बोर्ड परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया और काठमांडू के अमृत साइंस कैम्पस से विज्ञान के छात्र के रूप में इन्होंने 12वीं की पढ़ाई की. इन्होंने 12वीं की बोर्ड परीक्षा भी टॉप की. शिक्षा के क्षेत्र में शानदार उपलब्धि हासिल करने पर इन्हें कोलंबो प्लान के तहत वजीफा मिला जिसने उनके भारत के साथ शैक्षणिक रिश्तों को मजबूत किया. डा बाबूराम भट्टराई ने चंडीगढ़ कॉलेज आफ आर्किटेक्चर से स्थापत्य कला में स्नातक और इसके बाद इसी विषय में दिल्ली स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर से परास्नातक किया.
डा बाबूराम भट्टराई ने वर्ष 1986 में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से अपनी पीएचडी की. माओवादियों द्वारा पीपुल्स वार की शुरुआत करने पर वह वर्ष 1996 में छिप गए. माओवादियों ने यह लड़ाई राजशाही को समाप्त करने और देश का संविधान निर्वाचित सदस्यों द्वारा लिखने की मांग को लेकर शुरू की थी. इस संकट काल में भट्टराई भारतीय शहरों में छिपे और यहां के कम्युनिस्ट नेताओं के सम्पर्क में रहे.
वर्ष 2004-05 के दौरान भट्टराई के सम्बंध माओवादी प्रमुख पुष्प कमल दहल प्रचंड से अच्छे नहीं रहे जिसकी वजह से उन्हें और उनकी पत्नी को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया. साथ ही नेपाल के एक गांव में पति-पत्नी को नजरबंदी में रखा गया.
वर्ष 2006 में नेपाल की प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ समझौता करने के बाद माओवादियों ने जनता के साथ देश में 19 दिनों का प्रदर्शन किया. जनता के दबाव के चलते राजा ज्ञानेन्द्र को सत्ता से हटना पड़ा. इसके दो वर्ष बाद हुए ऐतिहासिक आम चुनावों में माओवादी सबसे बड़े दल के रूप में उभरे और गोरखा से भट्टराई सर्वाधिक मतों से विजयी हुए.
वर्ष 2009 में प्रचंड की सरकार गिरने के बाद दोनों में मतभेद एक बार फिर बढ़े जिसकी वजह से प्रचंड ने उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे नहीं किया. इसके बाद बदले राजनीतिक घटनाक्रम के बीच प्रचंड ने प्रधानमंत्री पद के लिए भट्टराई को अपना उम्मीदवार बनाया.
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