सर्वोच्च न्यायालय ने 13 सितंबर 2011 को संदिग्ध निष्ठा से संबंधित न्यायाधीशों के मामले में अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्ति का निर्णय दिया. सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने इस निर्णय में यह भी बताया कि संदिग्ध निष्ठा वाले न्यायाधीशों को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया जा सकता है, भले ही उनकी उम्र 50 वर्ष न हुई हो.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएम पांचाल और न्यायमूर्ति एचएल गोखले की पीठ ने तीन न्यायाधीशों आरएस वर्मा, रोहिल्ला और पीडी गुप्ता की संदिग्ध निष्ठा पर की गई सेवानिवृत्ति को कायम रखते हुए उपरोक्त व्यवस्था दी.
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अपने निर्णय में बताया कि दिल्ली उच्चतर न्यायिक सेवाओं के मूलभूत नियम यह पूर्ण अधिकार देते हैं कि दिल्ली उच्च न्यायालय की सलाह पर ऐसे अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्त कर दिया जाए, भले ही उनकी आयु 55 वर्ष से कम क्यों न हो. साथ ही पीठ ने यह भी तर्क दिया कि ऐसा कोई भी नियम नहीं है जिसमें किसी अधिकारी को इस आधार पर 55 वर्ष से पहले अनिवार्य सेवानिवृत्ति न दी जाए, जबकि उससे जुड़ा संदिग्ध निष्ठा का मामला 50 वर्ष की उम्र में सामने आया हो.
दिल्ली उच्चतर न्यायिक सेवा संहिता के एफआर 56 (जे) के तहत किसी भी सरकारी कर्मचारी को, जो 35 वर्ष की आयु से पहले नौकरी में शामिल होता है तो उसे 50 वर्ष से पहले अनिवार्य सेवानिवृत्त किया जा सकता है, अन्य मामले में यह सीमा 55 वर्ष की है.
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