सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को सिर्फ अश्लील और आपत्तिजनक नृत्य प्रतिबंधित करने न कि बार और रेस्त्रां डांसर को प्रतिबंधित करने हेतु विचार का समय दिया. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर, न्यायमूर्ति एसएस निज्जर और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने 8 सितंबर 2011 को बार और रेस्त्रां डांसर की आजीविका से संबंधित इस मुद्दे पर सोचने के लिए महाराष्ट्र सरकार को दो सप्ताह का समय दिया.
तीन सदस्यीय खंडपीठ के अनुसार नृत्य को अपने आप में अश्लील नहीं माना जा सकता, साथ ही उसे प्रतिबंधित करने से हजारों नर्तक बेरोजगार हो सकते हैं, जो उनको गलियों में उतरने पर मजबूर कर सकता है. अपने तर्क में खंडपीठ ने बताया कि बच्चे नृत्य करते हैं, कुछ स्थानों पर युगल भी नृत्य करते हैं, डांस फ्लोर भी बने हुए हैं. यानी सिर्फ ऐसा होने से वह अश्लील या आपत्तिजनक नहीं हो जाता.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर, न्यायमूर्ति एसएस निज्जर और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने महाराष्ट्र सरकार को बंबई पुलिस कानून की धारा 33 और 34 में कुछ ऐसे बदलाव करने का सुझाव दिया जिससे सिर्फ नृत्य के अश्लील और आपत्तिजनक प्रारूप को प्रतिबंधित किया जाए.
ज्ञातव्य हो कि बंबई उच्च न्यायालय ने बार और रेस्त्राओं में होने वाले डांस शो पर प्रतिबंध लगाने वाले मुंबई पुलिस के फैसले को वर्ष 2006 में निरस्त कर दिया था. मुंबई पुलिस ने डांस शो पर इस आधार पर प्रतिबंध लगाया था कि बार और रेस्त्रांओं में नृत्य अश्लील और उकसाने वाला होता है तथा कई लड़कियां जिस्मफरोशी में संलिप्त हो जाती हैं. सर्वोच्च न्यायालय में महाराष्ट्र सरकार ने बंबई उच्च न्यायालय के फैसले के निर्णय के विरुद्ध याचिका दायर की थी.
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