भारत की किस ऐतिहासिक इमारत को कहा जाता है ‘मुगलों का शयनागार’, जानें यहां
भारत में मुगलों ने करीब 331 सालों तक राज किया है। इस दौरान मुगलों ने भारत में कई ऐतिहासिक इमरातों का निर्माण करवाया। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि भारत में एक इमारत ऐसी भी है, जिसे ‘मुगलों का शयनागार’ भी कहा जाता है। कौन-सी है यह इमारत, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
भारत का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें यहां गुप्त, मौर्य, मुगल, दिल्ली सल्तनत और ब्रिटिश का शासन देखने को मिलता है। इन सभी शासकों ने कई सालों तक भारत पर राज किया है।
इतिहास के पन्नों के मुताबिक, मुगलों द्वारा भारत में करीब 331 सालों तक शासन किया गया। इस दौरान मुगलों ने भारत में कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण करवाया, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।
इस कड़ी में क्या आप जानते हैं कि मुगलों की एक इमारत ऐसी भी है, जिसे ‘मुगलों का शयनागार’(Dormitory of Mughals) भी कहा जाता है। कौन-सी है यह इमारत, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
किसे कहा जाता है ‘मुगलों का शयनागार’
सबसे पहले हम यह जान लेते हैं कि किस इमारत को ‘मुगलों का शयनागार’ भी कहा जाता है। आपको बता दें कि दिल्ली स्थित हुमायूं के मकबरे को ‘मुगलों का शयनागार’ भी कहा जाता है।
क्यों कहा जाता है ‘मुगलों का शयनागार’
हुमायूं के मकबरे में सिर्फ हुमायूं की कब्र नहीं है, बल्कि यहां मुगल राजवंश की 100 से अधिक कब्रें मौजूद हैं। यह कब्रें मकबरे के चारों तरफ बनी हुई हैं, जिन्हें विशेष रूप से एक-एक कमरे में बनाया गया है।
किन मुगल शासकों की कब्रें हैं मौजूद
हुमायूं के मकबरे में विभिन्न मुगल शासकों की कब्रें मौजूद हैं, जिनमे मुख्य कब्रें इस प्रकार हैंः
-दारा शिकोह(शाहजहां का सबसे बड़ा पुत्र)
-जहांदर शाह
-फरुखसियार
-आलमगीर-2
-रफी-उद-दरजात
-रफी-उद-दौला
कब और किसने करवाया था मकबरे का निर्माण
हुमायूं के मकबरे का निर्माण हुमायूं की मृत्यु के 9 साल बाद उनकी पत्नी हाजी बेगम ने 1565 से 1572 के बीच करवाया था। यह मकबरा चारबाग शैली का सबसे पहला उदाहरण था। हुमायूं का मकबरा ही वह पहली ऐतिहासिक इमारत हैं, जिसमें हमें दोहरा गुंबद की संरचना देखने को मिलती है।

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अंतिम मुगल शासक हुए थे गिरफ्तार
हुमायूं की मकबरा ही वह स्थान है, जहां से अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर-2 को गिरफ्तार किया गया था। दरअसल, 1857 की क्रांति के बाद दिल्ली के लाल किले से भागकर बहादुर शाह हुमायूं के मकबरे में पहुंच गए थे।
यहां वह अपने बेटे और पौते के साथ थे। इस बीच ब्रिटिश सेना का कैप्टन हडसन उन्हें ढूंढता हुआ यहां पहुंचा और दीवार तोड़ता हुआ अंदर दाखिला हुआ था। ब्रिटिश सेना ने बहादुर शाह जफर-2 को यहां से गिरफ्तार कर दिल्ली के लाल किले में कुछ समय के लिए रखा था, जिन्हें देखने के लिए ब्रिटिश परिवार के लोग पहुंचा करते थे।
उन पर मुकदमा चलाया गया और आखिर में रंगून भेज दिया गया, जहां उनकी मौत हो गई। वहीं, उनके बेटे और पौते को दिल्ली के खूनी दरवाजे के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस तरह मुगल वंश हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
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