दुनिया का सबसे महंगा रेडियोएक्टिव मेटल, 1 ग्राम की 225 करोड़ तक होती है कीमत
आपने दुनिया में अलग-अलग रेडियोएक्टिव मेटल्स के बारे में पढ़ा और सुना ही होगा। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि दुनिया का सबसे महंगा रेडियोएक्टिव मेटल 225 करोड़ रुपये प्रति ग्राम तक महंगा है। यह जितना महंगा है, उतना ही खतरनाक भी होता है।
आपने दुनिया में मौजूद अलग-अलग रेडियोएक्टिव मेटल के बारे में पढ़ा और सुना ही होगा। ये मेटल्स अपने गुणों के लिए जाने जाते हैं, जिनका उपयोग विज्ञान की दुनिया में अलग-अलग रिसर्च के लिए किया जाता है। हालांकि, क्या आप दुनिया के सबसे महंगे रेडियोएक्टिव मेटल के बारे में जानते हैं, जिसकी 1 ग्राम की कीमत 225 करोड़ रुपये तक होती है। यह जितना महंगा होता है, उतना ही खतरनाक भी होता है। इस लेख में हम इस बारे में विस्तार से जानेंगे।
सबसे महंगा रेडियोएक्टिव मेटल
कैलिफोर्नियम-252(Californium-252) दुनिया के सबसे खतरनाक और महंगे रासायनिक तत्वों में से एक है। इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 2.7 करोड़ डॉलर यानी करीब 220 से 225 करोड़ रुपये प्रति ग्राम तक होती है।
क्या होता है कैलिफोर्नियम-252?
यह एक सिंथेटिक रेडियोएक्टिव मेटल है। यह सामान्य रूप से प्रकृति या खानों में नहीं मिलता है। धातु के पीरियडिक टेबल में परमाणु नंबर की बात करें, तो यह 98 है और इसका सिंबल Cf है। इसकी खोज 1950 में अमेरिका की 'कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले' के वैज्ञानिकों ने की थी, जिसके आधार पर इसका नाम कैलिफोर्नियम रखा गया।
यह इतना महंगा क्यों है?
इसे केवल उच्च-क्षमता वाले परमाणु रिएक्टरों में ही बनाया जा सकता है। प्लूटोनियम या क्यूरियम जैसे तत्वों पर लंबे समय तक न्यूट्रॉन की लगातार बमबारी करने के बाद बेहद कम मात्रा में कैलिफोर्नियम-252 प्राप्त होता है। पूरी दुनिया में सिर्फ अमेरिका और रूस में ही इसे बनाने की तकनीक व रिएक्टर उपलब्ध हैं। दुनिया भर में हर साल इसका कुल उत्पादन कुछ मिलीग्राम ही हो पाता है। इसकी हाफ-लाइफ लगभग 2.6 वर्ष होती है, यानी समय के साथ यह खुद ही घटता चला जाता है।
कहां होता है इस्तेमाल
कैलिफोर्नियम-252 न्यूट्रॉन एमिटरके रूप में बेहद शक्तिशाली होता है। इसका उपयोग सर्वाइकल और दिमाग जैसे कुछ विशेष प्रकार के कैंसर के इलाज में ट्यूमर को खत्म करने के लिए किया जाता है। साथ ही, परमाणु संयंत्रों में Fission Chain Reaction शुरू करने के लिए भी इसका उपयोग 'इग्नाइटर' की तरह किया जाता है। वहीं, तेल के कुओं की ड्रिलिंग और जमीन के नीचे पानी, तेल या खनिजों की परत जांचने के लिए न्यूट्रॉन स्कैनिंग में इसका इस्तेमाल होता है। इसके अलावा, हवाई अड्डों और सुरक्षा जांच में विस्फोटकों, हथियारों तथा नशीले पदार्थों का पता लगाने वाले उपकरणों में भी इसका उपयोगा होता है।
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