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History of Tea: जानें क्या है चाय का इतिहास ?

History of Tea: अमूमन अधिकांश भारतीयों की सुबह चाय के साथ होती है। सुबह-सुबह कड़क चाय मिल जाने के बाद लोग अपने दिन की शुरुआत करते हैं। लेकिन, क्या आपको चाय के इतिहास के बारे में जानकारी है। यदि नहीं है, तो हम आज आपको इस लेख के माध्यम से चाय के इतिहास के बारे में जानकारी देंगे।  

History of Tea: जानें क्या है चाय का इतिहास ?
History of Tea: जानें क्या है चाय का इतिहास ?

History of Tea: भारत में तो चाय के बहुत दीवाने लोग हैं। इसके प्रति लोगों की दीवानगी ऐसी है कि बिना इसके किसी की सुबह तो किसी की शाम नहीं होती। यही नहीं चाय ने संबंधों  में भी अपनी पैठ बना ली है। यही वजह है कि किसी के घर मेहमान के रूप में पहुंचने पर सबसे पहले चाय-नाश्ता ही आता है। चाहे सर्दी हो या गर्मी या फिर बरसात, हर मौसम में चाय की मांग रहती है और इसके पीने वालों लोगों की कभी कमी नहीं रहती है। इस वजह से देश में कई जगहों पर चाय पर बड़े-बड़े स्टार्टअप भी खड़े हो गए हैं। आज हम आपको इस लेख के माध्यम से चाय के इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं कि आखिर चाय का जन्म कहां से हुआ था और भारत में इसका क्या इतिहास रहा है।  

 

चीन में हुई थी चाय की खोज

इतिहास से पता चलता है कि चाय चीन की देन है। यही से चाय पूरी दुनिया तक पहुंची। चाय की खोज ईसा पूर्व 2737 में चीन के सम्राट शेननंग ने की थी। वह अक्सर उबला पानी पीते थे। ऐसे में वह एक बार जंगल से गुजर रहे थे। रास्ते में आराम के दौरान पीने के लिए पानी उबाला जा रहा था। इस बीच बर्तन में पेड़ की कुछ पत्तियां आ गिरी, जिससे पानी का रंग बदल गया। जब इसे पिया तो पीने में ताजगी महसूस हुई, जिसे बाद में चाय कहा गया। इसके बाद करीब 2 हजार साल तक चाय चीन में नदारद रही। हालांकि, कुछ इतिहासकारों का यह भी कहना है कि पहले चाय की पत्तियों को खाया जाता था, लेकिन बाद में जब इसे पानी के साथ उबाला गया तो इसका स्वाद बदला और ताजगी महसूस हुई, जिसके बाद चाय की पत्तियों को पानी के साथ उबालकर पिया जाने लगा। 

चाय का वर्णन चीन में ईसा पूर्व 350 ईस्वी में हुआ था। 7वीं सदी तक आते-आते यह लोकप्रिय हो गई थी। यह भी कहा जाता है कि  छठी शताब्दी में चीन के हुनान प्रांत में भारतीय बौद्ध भिक्षु बिना सोए साधना करते थे। वह जागे रहने के लिए एक खास पौधे की पत्तियां चबाते थे, जो कि चाय की पत्तियां बताई जाती हैं। बौद्ध भिक्षुओं के जरिये ही चाय का प्रचार जापान और कोरिया में किया गया था, जिसके बाद यहां भी चाय लोकप्रिय हो गई थी।

 

 

 

सोना-चांदी के बदले खरीदी जाती थी चाय

 15वीं शताब्दी में पुर्तगाली, डच, फ्रेंच और ब्रिटिश सौदागर चीन पहुंचे थे। उन्होंने यहां से चाय को अपने देशों तक पहुंचाया। आपको बता दें कि शुरुआत में हर व्यक्ति चाय नहीं पी सकता था। केवल कुछ शाही परिवार ही इसका स्वाद लेते थे। क्योंकि, उस समय इसकी कीमत बहुत अधिक हुआ करती थी। उस समय चाय चीन के अलावा कहीं भी नहीं उगती थी, तो यूरोपीय व्यावसायी चीनी सौदागरों को सोना-चांदी देकर चाय खरीदकर ले जाते थे।

 

ब्रिटिश कारोबारी अफीम के बदले खरीदते थे चाय

ब्रिटिश कारोबारी चीन में अफीम के बदले चाय खरीदा करते थे। उस समय चीन में अफीम पर प्रतिबंध था, इसलिए ब्रिटिश अफीम के बदले चाय खरीदा करते थे।  साल 1838 में जब चीन में अफीम तस्करों के लिए मौत की सजा तय हुई, तब जाकर अंग्रेजों के पास चाय का संकट हुआ। यह संकट भारत में चाय के उत्पादन का कारण बना। 

असम में शुरू किया गया था पहला टी गार्डन 

 

 

अंग्रेज जब भारत में राज जमा रहे थे, तब उन्होंने असम के सिंगफो कबीले को पेय पदार्थ के रूप में कुछ पीते देखा, जो स्वाद और गुण में चाय जैसा लगा। इस अनुभव के बाद अंग्रेजों ने 1837 में असम के चौबा क्षेत्र में पहला इंग्लिश टी गार्डन शुरू किया। इसके बाद भारत में भी चाय का उत्पादन शुरू हो गया था। इसके साथ ही अंग्रेजों ने श्रीलंका में भी चाय का उत्पादन शुरू किया था। वर्तमान समय में चाय चीन के अलावा करीब 52 देशों में पी जाती है। आपको यह भी बता दें कि जब शुरुआत में चाय का उत्पादन शुरू हुआ था, तब भारतीय चाय का विरोध करते थे। यहां तक कि कुछ गांव वाले अपने बच्चों को चाय का सेवन नहीं करने देते थे। हालांकि, समय के साथ दौर बदला और चाय अधिकांश भारतीयों के जीवन का हिस्सा बन गई।

 

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