ऑनलाइन परीक्षा और फिर होने वाले ग्रुप डिस्कशन एवं इंटरव्यू के जरिए चुने गए उम्मीदवारों के बाद कई बैंकों ने मनिपाल स्कूल ऑफ बैंकिंग या एनआईआईटी स्कूल ऑफ बैंकिंग कोर्सेज के जरिए अधिकारियों की भर्ती करनी शुरु कर दी है. चुने गए उम्मीदवारों को कोर्स फीस देनी होती है जो आमतौर पर संबंधित बैंकों द्वारा उन्हें शैक्षिक ऋण (एजुकेशन लोन) के रूप में दिया जाता है. प्रशिक्षण अवधि के समाप्त होने और बैंक में नौकरी दिए जाने के बाद उम्मीदवारों को इस ऋण को चुकाना होता है l
बैंकिंग एंड फाइनैंस में पीजी डिप्लोमा : उपयोगी क्यों ?
बैंकिंग एंड फाइनैंस में पीजी डिप्लोमा के कोर्स को इस प्रकार तैयार किया गया है कि इसे पूरा करने के बाद उम्मीदवार सफल बैंकर बनने के लिए अनिवार्य सभी कौशलों से लैस हो सके. कुछ पहलुओं के लिहाज से यह उम्मीदवारों के लिए उपयोगी है :
- चयन प्रक्रिया अधिक कौशलोन्मुख हैः आईबीपीएस पीओ चयन प्रक्रिया के मुकाबले मनिपाल स्कूल ऑफ बैंकिंग की चयन प्रक्रिया अधिक कठिन है. इसके लिए आपको ऑनलाइन परीक्षा, साइकोमेट्रिक परीक्षा, ग्रुप डिस्कशन और पर्सनल इंटरव्यू में पास होना पड़ता है.
- आपको बहुत अच्छी तरह प्रशिक्षित किया जाता है : देश के बैंकिंग सेक्टर में काम करने की इच्छा रखने वाले किसी भी उम्मीदवार के लिए मनिपाल स्कूल ऑफ बैंकिंग में नव नियुक्त अधिकारियों को दिया जाने वाला प्रशिक्षण बहुत उपयोगी है.
- बैंकों को कुशल स्टाफ मिलता है : अकैडमी में अपना कोर्स पूरा कर लेने के बाद बैंक के नियमों और कानून के बारे में आपकी जानकारी काफी अच्छी हो जाती है. अपने प्रशिक्षण अवधि के दौरान ही आपको अलग– अलग शाखाओं (ब्रांचेज) के माहौल के बारे में पता चल जाता है. ऐसे स्टाफ को काम पर रखना बैंक के लिए भी लाभदायक होता है क्योंकि ये जिम्मेदारियां उठाने के लिए पहले से ही अच्छी तरह प्रशिक्षित होते हैं.
- इस प्रोग्राम के जरिए बैंक पैसे कमा सकते है : बैंकों के लिए यह प्रोग्राम राजस्व का स्रोत है क्योंकि बैंकों को छात्रों से तो पैसा मिलता ही है साथ ही कोर्स फीस का भुगतान करने के लिए बैंक रियायती दरों पर अधिक समय वाले ऋण भी मुहैया कराते हैं. इसलिए इस प्रोग्राम के जरिए बैंक छात्रों से पैसे कमाते हैं.
बैंकिंग एंड फाइनैंस में पीजी डिप्लोमा : आलोचना क्यों?
बैंकिंग एंड फाइनैंस सेक्टर में पीजी डिप्लोमा की अक्सर आलोचना की जाती है. ऐसा छात्रों द्वारा बैंक को दिया जाने वाला भारी कोर्स फीस की वजह से होता है. इसके अलावा छात्रों को बैंक में पांच साल की नौकरी करने संबंधी एक बॉन्ड भी भरना होता है या इस अवधि से पहले नौकरी छोड़ने के एवज में उन्हें बैंक को भारी मुआवजा देना पड़ता है.
- छात्रों को कमाने से पहले पैसे चुकाने होते हैं : छात्रों को अपना पहला पूरा वेतन कमाने से पहले पैसों का भुगतान करना होता है. यह स्थिति छात्रों पर खासकर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों पर दबाव बना देता है.
- लॉयल्टी बॉन्ड एक मुद्दा है : मनिपाल प्रोग्राम के जरिए बैंक में ज्वाइन करने पर आपको पांच वर्ष का एक बॉन्ड भरना होता है. यदि आप पांच वर्षों तक नौकरी नहीं करेंगें तो आपको बतौर मुआवजा बैंक को बहुत भारी जुर्माना देना होगा. यह बैंक के लिए तो अच्छा है लेकिन यह उम्मीदवार के विकल्पों पर प्रतिबंध लगा देता है.
- हाथ में बहुत कम वेतन का आना : इस प्रोग्राम के जरिए यदि आप बैंक में आते हैं तो ज्वाइन करने के बाद आपका वेतन बहुत कम होगा क्योंकि आपका ज्यादातर वेतन आपके द्वारा बैंक से लिए गए ऋण की किश्त के नाम पर काट लिया जाएगा.
- बैंकों को तुरंत स्टाफ नहीं मिलता : भारत में ज्यादातर बैंक अपनी शाखाओं (ब्रांचेज) में स्टाफ की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं. यदि वे मनिपाल प्रोग्राम के जरिए भर्ती करते हैं तो अधिकारियों के लिए उन्हें एक वर्ष तक का इंतजार करना होगा क्योंकि उसके बाद ही उन्हें शाखाओं में नियुक्त किया जा सकेगा.
मनिपाल स्कूल ऑफ बैंकिंग या एनआईआईटी स्कूल ऑफ बैंकिंग के सहयोग से विभिन्न बैंकों द्वारा बैंकिंग एंड फाइनैंस में कराया जाने वाला पीजी डिप्लोमा कोर्स बैंकरों के लिए बहुत अच्छा है क्योंकि वे अलग– अलग पृष्ठभूमि के होते हैं. अल्पावधि में देखा जाए तो यह अच्छा विकल्प नहीं हो सकता है लेकिन यदि आप बैंकर ही बनना चाहते हैं तो यह प्रोग्राम आपको अपने सपने को पूरा करने में काफी मदद करेगा.
शुभकामनाएं।
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