जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी सेनाओं के बीच अधिक सहयोग तथा सामंजस्य स्थापित करने के लिए 27 अप्रैल 2015 को रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए.
दोनों देशों ने वैश्विक सुरक्षा के बढ़ते खतरे के चलते 18 वर्ष बाद रक्षा सौदा में संशोधन करने का निर्णय लिया है.
इस समझौते पर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी, रक्षा सचिव, एश्टन कार्टर तथा जापानी विदेश मंत्री फुमियो किशिदा तथा रक्षा मंत्री जनरल नेकातनी द्वारा हस्ताक्षर किये गए.
यह समझौता जापानी प्रधानमंत्री शिंजो एबे की अमेरिका यात्रा से पहले किया गया है. इसके दिशा निर्देशों के अनुसार जापान और अमेरिका के बीच बैलिस्टिक मिसाइल, साइबर, समुद्री सुरक्षा तथा अंतरिक्ष हमलों के खिलाफ सुरक्षा को लेकर सैन्य सहयोग किया जायेगा.
इस समझौते के तहत सामूहिक आत्मरक्षा का अधिकार भी दिया गया है जिसके अनुसार जापान संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर छोड़ी गयी किसी मिसाइल को निशाना बना सकता है तथा मित्र देशों की सहायता ले सकता है.
इस समझौते के अनुसार युद्ध की स्थिति में अमेरिकी और जापानी सेनाएं संयुक्त रूप से पूर्वी चीन सागर अथवा उत्तर कोरिया में काम कर सकेंगी.
इससे किसी भी भौगोलिक बाधा को दरकिनार करते हुए अमेरिका और जापान न केवल वैश्विक मुद्दों पर आपसी सहयोग करेंगे बल्कि स्थानीय मुद्दों पर भी ध्यान केन्द्रित करेंगे.
इन संशोधित दिशानिर्देशों के चलते जापान के संविधान के कुछ हिस्सों में भी संशोधन की आवश्यकता है. यह समझौता एबे द्वारा जापान के संविधान को शांति सहयोग के लिए नरम बनाने की प्रतिबद्धता का ही हिस्सा है.
अमेरिका और जापान में पहली बार 1978 में रक्षा सम्बन्धी दिशा निर्देशों की स्थापना की गयी थी, इसके बाद शीत युद्ध के चरम समय में तथा वर्ष 1997 में यह समझौता किया गया.
नए दिशा-निर्देश जापान की बढती सैन्य शक्ति को प्रतिबिंबित करते हैं तथा क्षेत्र में उसके प्रभाव को भी दर्शाते हैं.
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