भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों में रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग महत्वपूर्ण घटक है. दो-दशकों से भी अधिक समय से खास तौर पर 2005 में जब से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों के लिए नई रूपरेखा लागू हुई है, दोनों ही देशों ने व्यापक-रेंज वाली सामरिक भागीदारी का निर्माण किया है.
2005 की रूपरेखा के साथ 2015 की नवीकृत रूपरेखा ने रक्षा व्यापार, संयुक्त अभ्यासों, कर्मचारियों के आदान-प्रदान, समुद्र सुरक्षा एवं काउंटर-पायरेसी में गठबंधन एवं सहयोग एवं तीन सेवाओं में से प्रत्येक के बीच आदान-प्रदान कर संबंधों को गहरा बनाने की कोशिश की है.
व्यवसाय को बढ़ाने की इच्छा जनवरी 2015 में बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान एशिया-प्रशांत एवं हिन्द महासागर क्षेत्र के लिए संयुक्त रणनीतिक विजन में अच्छी तरह से दिखाई देता है.
यह विजन एनडीए सरकार की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को बताता है और इसी क्रम में ओबामा प्रशासन के एशिया सिद्धांत को उजागर करता है.
'एक्ट ईस्ट पॉलिसी', जिसे अगस्त 2014 में सबके सामने रखा गया था, नरसिम्हा राव सरकार की 'पूर्व की ओर देखो नीति' पर बना है और इसमें जीवंत एशिया यानि भारत और आसियान देशों के दो विकास ध्रुवों के बीच विकास की कल्पना की गयी है.
पीवोट टू एशिया पॉलिसी के तहत, अमेरिकी शासनकाल द्वारा अगले दशक में किए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक होगा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कूटनीतिक, आर्थिक, रणनीतिक और अन्य क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश को बढ़ावा देना.
अमेरिका को भारत की जरूरत क्यों है?
• एशिया का उद्भव : 21वीं शताब्दी एशिया की सदी है. विशेषज्ञों के अनुसार इस सदी में होने वाली समृद्धि अधिकांशतः एशिया-प्रशांत क्षेत्र से आएगी. इसलिए दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक शक्ति का इस इलाके में नए गठबंधन बनाना तर्कसंगत है. एशिया के भीतर, चीन के अलावा, भारत ही सिर्फ प्रमुख देश है जिसेक साथ अमेरिका के सैन्य संबंध बहुत बेहतर नहीं हैं बावजूद इसके कि अमेरिका दुनिया में दूसरा प्रमुख व्यापार भागीदार है. द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद से अमेरिका इलाके के प्रमुख देशों-जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, इंडोनेशिया आदि को अपने मित्र देश के दायरे में ला सकता है. इसलिए भारत के साथ भागीदारी करना अमेरिका के लिए एकमात्र विकल्प रह जाता है.
• चीन की चुनौतीः वर्तमान वैश्विक गतिशीलता को ध्यान में रखते हुए चीन ही एक मात्र ऐसा देश है जो आने वाले समय में अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दे सकता है. चीन के तथाकथित 'शांतिपूर्ण विकास' रणनीति का मुकाबला करने के लिए, भारत अमेरिका के लिए सबसे अच्छा सहयोगी हो सकता है क्योंकि यह 3500 किमी लंबी भू-सीमा साझा करता है.
• भारत का आकर्षक हथियार बाजार : फरवरी 2016 में जारी SIPRI की रिपोर्ट के अनुसार 2011 और 2015 के बीच पांच वर्षों की अवधि में भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश रहा है. यह प्रवृत्ति दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्यातक के लिए मौजूदा बाजारों (जैसे यूरोप) और प्रतिस्पर्धा (चीन से) में पूर्णता आने के संदर्भ में बड़ा अवसर प्रदान करता है.
• भू–रणनीतिक गतिशीलता : भारत के साथ सैन्य संबंध अमेरिका के लिए प्रमुख आवश्यकता है क्योंकि अफगानिस्तान-पाकिस्तान, इराक, ईरान आदि समेत इलाके में इसके सुरक्षा हित हैं. अप्रैल 2016 में हुए रसद आदान–प्रदान ज्ञापन समझौता (Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA)) के लिए सैद्धांतिक मंजूरी के विकेंद्रत करने और रसद के समर्थन, आपूर्ति और सेवा के प्रावधानों पर अमेरिकी सेना पर दबाव डालने की उम्मीद है.
• औपनिवेशिक काल से ही दक्षिण एशिया वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में रहा है. यह इलाका खासकर भारत, अपने रणनीतिक स्थिति-हिन्द महासागर, मध्य एशिया क्षेत्र से कनेक्टिविटी आदि की वजह से विश्व के प्रमुख सैन्य शक्ति के लिए सैन्य दृष्टि से काफी महत्व रखता है.
• भारत का ट्रैक रिकॉर्ड : इलाके में बेहतर रक्षा सहयोगी बनने के लिए भारत अधिक योग्य है क्योंकि यहां सैन्य-नागरिक संबंध सौहार्दपूर्ण है और लोकतंत्र क्रियाशील है. इस दृष्टि से जून 2016 में अमेरिका ने भारत को प्रमुख रक्षा भागीदार के तौर पर मान्यता प्रदान की, इससे भारत को अमेरिका से अधिक उन्नत और संवेदनशील तकनीक खरीदने की अनुमति होगी.
• आतंकवाद : आज के समय में आतंकवाद निराकार, सीमा से परे और राज्यविहीन है. यह किसी भी स्रोत से और किसी भी रूप में पैदा हो सकता है.इसलिए यह भागीदारी पायरेसी, अवैध प्रवास, साइबर खतरों, रसायन, परमाणु और जैविक हथियारों से पैदा होने वाले खतरों से निपटने के लिए अनिवार्य है.
• गहरे समुद्रों में श्रेष्ठता बनाए रखना : आखिर में अपने बेहतरीन नौसेना शक्ति के कारण अमेरिका उभरा और अभी तक विश्व का प्रमुख सैन्य शक्ति बना हुआ है. इसलिए गहरे समुद्र में अपना वर्चस्व बनाए रखने की अमेरिका की इच्छा के कारन हिन्द महासागर में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने वाले भारत के साथ गठबंधन करना मजबूरी है.
• इसके लिए हाल के द्विपक्षीय संबंधों के मूल में अमेरिका को समग्रता के साथ समुद्री सुरक्षा को रखना होगा. मई 2016 में हुए आरंभिक समुद्री सुरक्षा वार्ता और मालाबार अभ्यास 2016, (दक्षिण चीन सागर के पास) में जापान को शामिल किया जाने से इसका महत्व सिद्ध होता है.
सहयोग से भारत को कैसे फायदा होगा?
• परमाणु खतरे को रोकना : भारत परमाणु हथियारों से लैस दो देशों-चीन और पाकिस्तान के बीच आता है. इसलिए प्रमुख रक्षा बल के तौर पर देखे और माने जाने के क्रम में भारत द्वारा अत्याधुनिक परमाणु तकनीक को बनाए रखना अनिवार्य है.ऐसा करने के लिए परमाणु सामग्रियों और संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच, निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं जैसे परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी), मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजाइम (एमटीसीआर), वासेनार अरेंजमेंट और ऑस्ट्रेलियाई समूह की सदस्यता कुंजी है.इस तक पहुंच और सदस्यता के लिए अमेरिकी नेतृत्व ने कई वर्षों बाद भारत को समर्थन देने की खुले तौर पर घोषणा की है. इसमें जून 2016 में मोदी के वाइट हाइस दौरे के दौरान जारी किया गया वह संयुक्त कथन भी है जिसमें कहा गया था कि भारत-अमेरिका 21वीं सदी में मजबूत वैश्विक भागीदार होंगे.
• सेना का आधुनिकीकरण : रक्षा मंत्रालय ने 15 वर्ष की अवधि वाले दीर्घकालिक एकीकृत दृष्टिकोण योजना (एलटीआईपीपी) की घोषणा 2013 में की थी. एलटीआईपीपी का फोकस 2027 तक 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर की अनुमानित लागत के साथ भारतीय सैन्य बल का आधुनिकीकरण था.
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमेरिका बड़ी भूमिका निभा सकता है क्योंकि यहां बोइंग, लॉकहीड मार्टिन, बीएई सिस्टम्स आदि जैसी विश्व की प्रमुख रक्षा एवं एयरोस्पेस कंपनियां हैं और यह उम्मीद अनुचित नहीं है क्योंकि 2012 में स्थापना के बाद से ही अमेरिका-भारत रक्षा तकनीक एवं व्यापार पहल (डीटीटीआई) ने परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है और रक्षा क्षेत्र में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, रक्षा खरीद प्रक्रिया 2016 समेत हालिया नीतिगत उपायों की श्रृंखला ने स्वदेशी उत्पादन की सुविधा दी है.
• चीन का मुकाबला : चीन का ‘String of Pearls’ का सिद्धांत भारत के क्षेत्रीय शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा के लिए प्रमुख चुनौती है. इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए अमेरिका जैसी बड़ी शक्ति का साथ होना भारत के लिए हितकर होगा.
• पाकिस्तान का विरोध : पाकिस्तान शीत युद्ध के समय से ही अमेरिका का सहयोगी रहा है. सुरक्षा की दृष्टि से पाकिस्तान बार-बार भारत के लिए खतरा साबित हुआ है क्योंकि यह सीमा पार आतंकवाद का स्रोत रहा है.इसलिए पाकिस्तान पर सैन्य नियंत्रण बनाए रखने के लिए भारत का अमेरिका के साथ होना सबसे अच्छा रहेगा. यह कारगिल युद्ध के दौरान साबित भी हो चुका है.1999 में हुए इस युद्ध के दौरान क्लिंटन प्रशासन ने पाकिस्तान पर सेना वापस बुलाने के लिए सफल दबाव बनाया और फलस्वरूप दो पड़ोसियों के बीच प्रमुख युद्ध समाप्त हुआ.
निष्कर्ष
प्रशिक्षित मानव संसाधनों, तकनीक, अनुसंधान, विकास एवं उत्पादन के लिहाज से निस्संदेह, अमेरिका विश्व का प्रमुख सैन्य शक्ति है. इसलिए भारत के लिए अमेरिका और उसके जैसे भागीदारों (जैसे इस्राइल, जर्मनी आदि) की क्षमताओं का लाभ उठाने के लिए इन देशों के साथ गठबंधन को मजबूत बनाना जरूरी है.
हालांकि गठबंधन बिना किसी बाधा, असफलता और नुकासन के नहीं होता. सिनेट का नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट 2017, जिसमें नाटो सहयोगियों के साथ ' वैश्विक रणनीतिक एवं रक्षा भागीदार दर्जा' का प्रस्ताव दिया गया था, में संशोधन से इंकार करने के बाद भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर कैपिटल हिल में आम सहमती न होने के संकेत मिले हैं.
इसी तरह कई अवसरों पर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि चीन के प्रिज्म के माध्यम से अमेरिका के साथ संबंधों को देखने की भारत का जुनून उसकी संप्रभुता पर संकट पैदा कर सकता है और राष्ट्र के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के लिए हानिकारक हो सकता है.
फिर भी ये छोटी-मोटी असफलताएं एवं निराधार आशंका भारत और अमेरिका के संबंधों में खटास नहीं ला सकती. इसमें कोई संदेह नहीं है कि, 'एनएएम न्यूट्रल मोड' से' एलाइनमेंट विद द डी–फेक्टो सुपर पावर' में विदेश नीति का बदलना खुद में इस बाद का संकेत है कि भारत खुद को वैश्विक राजनीतिक गतिशीलता के साथ बदलने का प्रयास कर रहा है.
19वीं सदी के ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधानमंत्री हेनरी जॉन टेम्ल ने सही कहा था–वैश्विक राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता बल्कि सिर्फ स्थायी हित होते हैं.
कुल मिलाकर अगर भारत प्रमुख शक्तियों की लीग में शामिल होना चाहता है तो वर्तमान परिस्थितियों में भारत को अमेरिका के साथ रक्षा और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाना होगा.
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