दिल्ली उच्च न्यायालय ने 4 अप्रैल 2016 को एक आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए निर्णय दिया कि किसी अपराधिक मामले को अनिश्चित अवधि के लिए लंबित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है.
यह फैसला जस्टिस सुरेश कैत द्वारा जोगिन्दर सिंह वर्सेज राज्य (एनसीटी दिल्ली) मामले में सुनाया गया.
अदालत ने जोगिंदर सिंह के खिलाफ मंगोलपुरी थाने में दर्ज की गई एफआईआर को भी रद्द कर दिया जिसमें उसके खिलाफ चोरी की कार के दस्तावेजों के साथ जालसाजी के आरोप लगाये गये थे.
आरोपी के खिलाफ वर्ष 1998 से यह मामला लंबित था. उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 468 (जालसाजी एवं धोखाधड़ी) एवं 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग करना) के तहत मामला दर्ज किया गया था.
न्यायालय ने कहा कि किसी भी प्रमाण के बिना केवल बयानों के आधार पर किसी पर केस दर्ज नहीं किया जा सकता.
एफआईआर को ख़ारिज करते हुए अदालत ने वर्ष 2009 के वकील प्रसाद सिंह बनाम राज्य बिहार केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया.
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