धारा 377 के गैर-अपराधीकरण से एलजीबीटीक्यू समुदाय होंगे कलंक मुक्त: सुप्रीम कोर्ट

Jul 14, 2018, 08:35 IST

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई कर रही हैं. पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं.

Once criminality under section 377 goes, discrimination against LGBTQ will go: SC
Once criminality under section 377 goes, discrimination against LGBTQ will go: SC

सुप्रीम कोर्ट (एससी) ने समलैंगिकता के अपराधीकरण से जुड़ी धारा 377 पर सुनवाई के दौरान कहा है कि सहमति से समलैंगिक यौन रिश्तों को अपराध के दायरे से बाहर करते ही एलजीबीटीक्यू समुदाय कलंक मुक्त हो जाएगा और उसके प्रति सामाजिक भेदभाव खत्म हो जाएगा. बतौर सुप्रीम कोर्ट, एलजीबीटीक्यू समुदाय से भेदभाव ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाला है.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई कर रही हैं. पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं.

सरकार ने एकांत में परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच कृत्यों से संबंधित धारा 377 की संवैधानिक वैधता की परख करने का मामला शीर्ष अदालत के विवेक पर छोड़ दिया था. सरकार ने कहा था कि समलैंगिक विवाह, गोद लेना और दूसरे नागरिक अधिकारों पर उसे विचार नहीं करना चाहिए.

सुनवाई से संबंधित मुख्य तथ्य:

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा ऐसे लोगों के साथ भेदभाव ने उनके मानसिक स्वास्थ पर भी प्रतिकूल असर डाला है.
  • पीठ ने मानसिक स्वास्थ देखभाल कानून के प्रावधान का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें भी इस तथ्य को मान्यता दी गई है कि लैंगिक रुझान के आधार पर ऐसे व्यक्तियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता.
  • सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से समलैंगिक समुदाय के साथ सामाजिक भेदभाव का मुद्दा उठाते हुए कोर्ट से सिद्धांत तय करने की मांग की.
  • कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका फैसला 'पब्लिक ओपिनियन'(समाज की अवधारणा) पर नहीं बल्कि कानून की वैधानिकता पर करेंगे.
  • कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक संबंध अपराध नहीं रहेंगे तो इससे जुड़ा सामाजिक कलंक और भेदभाव भी खत्म हो जाएगा. हालांकि कोर्ट ने कहा कि वह धारा 377 (समलैंगिकता) के सभी पहलुओं पर विचार करेगा. यह धारा अप्राकृतिक यौनाचार को दंडनीय घोषित करती है.

                                                            आईपीसी धारा 377:

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है. आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ यौन संबंध बनाता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा. उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा. यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है.

 

एलजीबीटीक्यू समुदाय क्या है?

एलजीबीटीक्यू समुदाय के तहत लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंटर और क्वीयर आते हैं. एक अर्से से इस समुदाय की मांग है कि उन्हें उनका हक दिया जाए और धारा 377 को अवैध ठहराया जाए. निजता का अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस समुदाय ने अपनी मांगों को फिर से तेज कर दिया था.

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